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Home»Policy Watch»बच्चों की प्राइवेसी और मानसिक स्वास्थ्य पर Meta पर मुकदमा, हारने पर ₹133.92 लाख करोड़ तक का जुर्माना
Policy Watch

बच्चों की प्राइवेसी और मानसिक स्वास्थ्य पर Meta पर मुकदमा, हारने पर ₹133.92 लाख करोड़ तक का जुर्माना

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksAugust 20, 2026No Comments4 Mins Read
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अमेरिकी राज्यों ने Facebook और Instagram के डिजाइन व एल्गोरिदम पर उठाए सवाल; लाइक काउंट हटाने, ऑटोप्ले-इनफिनिट स्क्रॉल रोकने और पैरेंटल कंट्रोल सख्त करने की मांग
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नई दिल्ली। बच्चों की प्राइवेसी के कथित उल्लंघन और सोशल मीडिया के कारण उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहे असर को लेकर Meta के खिलाफ अमेरिका में कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। कैलिफोर्निया के ऑकलैंड में मामले की सुनवाई शुरू हो चुकी है। आरोप है कि Facebook और Instagram के डिजाइन तथा एल्गोरिदम युवाओं को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने और उनकी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी एकत्र करने के लिए तैयार किए गए हैं। यदि Meta मामले में हारती है तो उस पर करीब 1.4 ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग ₹133.92 लाख करोड़ तक का जुर्माना लग सकता है।

मामले में अमेरिकी राज्यों की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के काम करने के तरीके और बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई बड़े बदलावों की मांग की गई है। राज्यों का तर्क है कि नाबालिगों के लिए ऐसे फीचर्स सीमित किए जाने चाहिए जो सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल, सामाजिक तुलना और मानसिक दबाव को बढ़ा सकते हैं। मुकदमे का संभावित फैसला Meta के साथ-साथ दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की नीतियों को भी प्रभावित कर सकता है।

राज्यों की प्रमुख मांगों में Facebook और Instagram पर युवाओं के लिए लाइक काउंट हटाना शामिल है। उनका कहना है कि पोस्ट पर कितने लाइक मिले, इसकी सार्वजनिक जानकारी बच्चों और किशोरों में दूसरों से तुलना की भावना बढ़ा सकती है। लाइक की संख्या दिखाई नहीं देने से सोशल मीडिया पर लोकप्रियता को लेकर बनने वाला दबाव कम किया जा सकता है।

दूसरी बड़ी मांग ऑटोप्ले और इनफिनिट स्क्रॉल जैसे फीचर्स पर रोक लगाने की है। इन सुविधाओं के कारण उपयोगकर्ता बिना किसी स्पष्ट ब्रेक के लगातार वीडियो और पोस्ट देखते रह सकते हैं। राज्यों का आरोप है कि ऐसे डिजाइन बच्चों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने में मदद करते हैं। इसलिए इनके इस्तेमाल को सीमित करने या समाप्त करने की मांग की गई है।

तीसरे प्रस्ताव में ब्यूटी फिल्टर्स और डिसअपिययरिंग पोस्ट जैसे फीचर्स पर सख्त नियंत्रण की मांग है। चेहरे की बनावट बदलने वाले फिल्टर्स बच्चों और किशोरों में अपनी वास्तविक शक्ल को लेकर असंतोष बढ़ा सकते हैं। वहीं, स्टोरीज जैसे अस्थायी कंटेंट फीचर्स लगातार पोस्ट देखने और साझा करने की आदत को बढ़ावा देने की वजह से जांच के दायरे में हैं।

चौथी मांग सोशल मीडिया के एल्गोरिदम में बदलाव से जुड़ी है। राज्यों का आरोप है कि प्लेटफॉर्म ऐसे कंटेंट की सिफारिश करते हैं जो उपयोगकर्ताओं को अधिक समय तक जोड़े रखता है। इसके लिए एल्गोरिदम में ऐसे बदलाव की मांग की गई है जिससे बच्चों को अत्यधिक या संभावित रूप से नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री की लगातार सिफारिश न हो।

पांचवीं मांग अभिभावकीय नियंत्रण को मजबूत करने की है। इसमें माता-पिता के सत्यापन को अनिवार्य बनाने, नोटिफिकेशन के लिए समय सीमा तय करने और एक ही बच्चे द्वारा कई फर्जी अकाउंट बनाए जाने पर रोक लगाने जैसे उपाय शामिल हैं। उद्देश्य यह है कि नाबालिगों की ऑनलाइन गतिविधियों पर परिवारों को अधिक नियंत्रण और जानकारी मिल सके।

यह विवाद केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ में भी बच्चों के डेटा के कथित दुरुपयोग, साइबर बुलिंग और ऑनलाइन सुरक्षा नियमों के उल्लंघन को लेकर Meta पर कार्रवाई और भारी जुर्माने के मामले सामने आ चुके हैं। इससे सोशल मीडिया कंपनियों पर नाबालिगों की सुरक्षा के लिए अधिक सख्त व्यवस्था लागू करने का दबाव बढ़ा है।

अमेरिका में भी Meta और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के खिलाफ कई मुकदमे चल रहे हैं। 1,200 से अधिक अमेरिकी स्कूल जिलों ने बच्चों में बढ़ते मानसिक संकट से जुड़े खर्च और प्रभाव को लेकर सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की है। टेनेसी और लॉस एंजिल्स की अदालतों में भी अलग-अलग मामले चल रहे हैं।

Meta ने आरोपों को खारिज किया है। कंपनी का कहना है कि वह युवाओं की सुरक्षा को गंभीरता से लेती है और इस दिशा में विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर लगातार काम करती रही है। अब ऑकलैंड में चल रहा मुकदमा यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए अपने उत्पादों के डिजाइन, डेटा उपयोग और एल्गोरिदम को किस हद तक बदलने के लिए बाध्य किए जा सकते हैं।

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