नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार ने अक्टूबर की शुरुआत भारी बिकवाली के साथ की है। वैश्विक और घरेलू मोर्चे पर बने कई दबावों के बीच इस छोटे कारोबारी सप्ताह में बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब ₹20 लाख करोड़ घट गया। सितंबर सीरीज के कमजोर प्रदर्शन के बाद अक्टूबर के शुरुआती कारोबार में भी बिकवाली जारी रहने से निवेशकों की चिंता बढ़ी है।
बिकवाली का असर बाजार के कई प्रमुख शेयरों पर दिखाई दिया। निफ्टी 50 के 12 शेयर 52 हफ्ते के निचले स्तर पर पहुंच गए। इनमें मारुति सुजुकी, महिंद्रा एंड महिंद्रा, आईटीसी, एनटीपीसी, हिंदुस्तान यूनिलीवर, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, रिलायंस इंडस्ट्रीज और ओएनजीसी जैसे प्रमुख शेयर शामिल हैं। मौजूदा रुझान जारी रहने पर निफ्टी के लगातार आठ साप्ताहिक गिरावट दर्ज करने की स्थिति बन सकती है। करीब 25 वर्षों में ऐसा पहली बार देखने को मिल सकता है।
बाजार में इस हफ्ते आई कमजोरी के पीछे पांच प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
कच्चा तेल ₹100 के करीब पहुंचा
कच्चे तेल की बढ़ती कीमत भारतीय बाजार के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बन गई है। दिसंबर डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड फिर करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। सप्ताह की शुरुआत में इसकी कीमत करीब 96-97 डॉलर प्रति बैरल थी।
भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहने पर देश का आयात बिल बढ़ सकता है। इससे महंगाई, चालू खाते और रुपये पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। ईंधन और परिवहन लागत में बढ़ोतरी से कंपनियों के मार्जिन तथा घरेलू खर्च पर भी असर पड़ सकता है।
FII की भारी बिकवाली
विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली बाजार पर दूसरा बड़ा दबाव है। इस साल अब तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों के नकद बाजार में करीब ₹2.5 लाख करोड़ की बिकवाली कर चुके हैं।
जुलाई और अगस्त में कुछ समय के लिए विदेशी निवेशकों की खरीदारी देखने को मिली थी, लेकिन सितंबर में रुख फिर बदल गया। सितंबर में विदेशी निवेशकों ने ₹36,000 करोड़ से अधिक के शेयर बेचे। विदेशी पूंजी की लगातार निकासी से खासकर बड़े और प्रमुख शेयरों पर दबाव बढ़ सकता है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और कमजोर रुपया
अमेरिका में बॉन्ड यील्ड के ऊंचे स्तर ने भी वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ाई है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड करीब 5.3% और 30-वर्षीय यील्ड लगभग 5.7% के स्तर पर रही।
अमेरिकी यील्ड बढ़ने पर डॉलर आधारित निवेश अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकता है, जिससे उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह प्रभावित होने की आशंका रहती है। महंगे कच्चे तेल और मजबूत डॉलर के बीच रुपये पर भी दबाव बढ़ा है और यह 96 रुपये प्रति डॉलर के स्तर से नीचे कमजोर हुआ है।
कमजोर रुपये से आयात महंगा हो सकता है। खासकर आयातित कच्चे माल और अन्य इनपुट पर निर्भर कंपनियों की लागत बढ़ने की संभावना रहती है।
IPO और ब्लॉक डील की लगातार आपूर्ति
बाजार में नई इक्विटी की लगातार बढ़ती आपूर्ति भी निवेशकों के लिए चिंता का विषय है। इस साल करीब 100 मेनबोर्ड कंपनियां IPO के जरिए लगभग ₹1.13 लाख करोड़ जुटा चुकी हैं।
इसके अलावा साल के पहले नौ महीनों में करीब ₹1 लाख करोड़ के ब्लॉक डील हुए हैं। यह राशि पूरे 2025 में हुए ब्लॉक डील के लगभग बराबर है। ऐसे समय में जब विदेशी निवेशक भी बड़ी मात्रा में शेयर बेच रहे हैं, कंपनियों की ओर से लगातार पूंजी जुटाने से बाजार में उपलब्ध निवेश योग्य धन पर दबाव पड़ सकता है।
वैश्विक ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता
वैश्विक मौद्रिक नीति को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी निवेशकों की सतर्कता बढ़ाई है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व और भारतीय रिजर्व बैंक के अगले कदमों पर बाजार की नजर है। ब्याज दरों में बदलाव का असर शेयरों के मूल्यांकन, पूंजी प्रवाह और बाजार की तरलता पर पड़ सकता है।
अमेरिका में इस साल आगे ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं को लेकर भी बाजार में चर्चा है। वहीं, आरबीआई की आगामी मौद्रिक नीति बैठक महत्वपूर्ण होगी। यदि वैश्विक स्तर पर ब्याज दरें ऊंची रहती हैं या मौद्रिक नीति सख्त होती है तो कर्ज की लागत और निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
इन पांचों कारकों ने मिलकर भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बढ़ाया है। महंगा कच्चा तेल, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कमजोर रुपया और नई इक्विटी की लगातार आपूर्ति ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया है।
आने वाले कारोबारी सत्रों में कच्चे तेल की कीमत, FII का निवेश, रुपये की चाल और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बाजार के लिए अहम संकेतक रहेंगे। इसके साथ ही केंद्रीय बैंकों के फैसलों और नए आर्थिक आंकड़ों पर भी निवेशकों की नजर रहेगी। बाजार की आगे की दिशा इन घरेलू और वैश्विक संकेतकों के बीच संतुलन पर निर्भर करेगी।
