नई दिल्ली। रेड बुल ने अपने पेय पदार्थों के लेबल और प्रचार सामग्री से ‘एनर्जी’ शब्द हटाने के खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी है। कंपनी का कहना है कि नियामक ने आदेश जारी करने से पहले उसे कोई कारण बताओ नोटिस नहीं दिया और अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं दिया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने एफएसएसएआई से यह जांचने को कहा कि आदेश जारी करने से पहले रेड बुल को कोई नोटिस दिया गया था या नहीं। मामले को आगे की सुनवाई के लिए मंगलवार को सूचीबद्ध किया गया है।
यह विवाद एफएसएसएआई के 1 जुलाई के उस आदेश के बाद सामने आया, जिसमें रेड बुल समेत कई पेय ब्रांडों को अपने उत्पादों के लेबल, विपणन और विज्ञापनों से ‘एनर्जी’ शब्द हटाने का निर्देश दिया गया था। प्रभावित ब्रांडों में स्टिंग, एड्रेनालिन रश, कैंपा गोल्ड बूस्ट, हेल एनर्जी और मॉन्स्टर भी शामिल हैं। नियामक ने कंपनियों को बदलाव लागू करने के लिए 90 दिन की समयसीमा दी थी।
एफएसएसएआई का कहना है कि ‘एनर्जी ड्रिंक’ को अलग खाद्य श्रेणी के तौर पर मान्यता नहीं है, क्योंकि इसके लिए निर्धारित श्रेणी मानक मौजूद नहीं हैं। नियामक ने कुछ ऐसे दावों पर भी चिंता जताई है जिनमें पेय पदार्थों को शरीर और दिमाग को सक्रिय या स्फूर्तिवान बनाने जैसे प्रभावों से जोड़ा जाता है। एफएसएसएआई के अनुसार, इस तरह के दावे उपभोक्ताओं के बीच भ्रम पैदा कर सकते हैं।
नियामक ने प्रभावित उत्पादों के लिए ‘कैफीनयुक्त पेय’ नाम इस्तेमाल करने का सुझाव दिया है। हालांकि, पेय उद्योग के प्रतिनिधियों ने इस शब्दावली पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि ‘कैफीनयुक्त पेय’ एक बहुत व्यापक श्रेणी हो सकती है, जिसमें शीतल पेय से लेकर कॉफी तक कई तरह के उत्पाद शामिल हो सकते हैं। उद्योग का कहना है कि इससे उपभोक्ताओं के लिए उत्पादों की प्रकृति को समझने में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
उद्योग ने एफएसएसएआई के अप्रैल 2024 के एक पुराने संचार का भी हवाला दिया है। उसके अनुसार, उस समय ‘कैफीनयुक्त पेय’ के रूप में लाइसेंस प्राप्त उत्पादों के लिए ‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द के इस्तेमाल की अनुमति दी गई थी। अब नियामक के नए रुख के बाद कंपनियों के सामने लेबल, पैकेजिंग और प्रचार सामग्री में बदलाव करने की स्थिति बन गई है।
कैफीन की मात्रा को लेकर एफएसएसएआई ने वर्ष 2016 में ऐसे पेय पदार्थों के लिए अधिकतम सीमा तय की थी। नियमों के तहत प्रति लीटर पेय में कैफीन की मात्रा 300 मिलीग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए। साथ ही कंपनियों के लिए उत्पाद के लेबल पर कैफीन की मात्रा स्पष्ट रूप से बताना अनिवार्य किया गया था।
इस मामले में भारतीय पेय उद्योग संघ ने नियामक से कार्रवाई लागू करने से पहले परामर्श और जोखिम-आधारित प्रक्रिया अपनाने की मांग की है। संघ का कहना है कि कंपनियों को किसी भी प्रवर्तन कार्रवाई से पहले अपने तकनीकी और कानूनी पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। उद्योग का विरोध मुख्य रूप से उत्पादों की शब्दावली और नियामकीय प्रक्रिया से जुड़ा है।
एफएसएसएआई के निर्देशों का असर कंपनियों की पैकेजिंग और विज्ञापन रणनीति पर भी पड़ा है। कुछ कंपनियों ने नियामकीय आवश्यकताओं के अनुरूप अपने उत्पादों के नाम और प्रचार सामग्री में बदलाव शुरू कर दिए हैं। स्टिंग बनाने वाली कंपनी ने भी कहा है कि वह लागू नियमों के अनुपालन के लिए अपने उत्पाद से ‘एनर्जी’ शब्द हटाने की प्रक्रिया अपना रही है।
रेड बुल की याचिका के बाद विवाद का केंद्र अब दो प्रमुख सवालों पर है। पहला, क्या एफएसएसएआई ने लेबलिंग में बदलाव का निर्देश जारी करने से पहले कंपनी को उचित प्रक्रिया के तहत नोटिस और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया था। दूसरा, प्रभावित पेय पदार्थों को भविष्य में किस श्रेणी और नाम के तहत बाजार में पेश किया जाना चाहिए।
अदालत की अगली सुनवाई में एफएसएसएआई की ओर से नोटिस जारी किए जाने से संबंधित स्थिति स्पष्ट किए जाने की उम्मीद है। इसके बाद यह तय होगा कि मामले में आगे की कानूनी कार्यवाही किस दिशा में बढ़ती है। फिलहाल कंपनियों और नियामक के बीच विवाद ‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द के इस्तेमाल, उत्पादों की श्रेणी और लेबलिंग प्रक्रिया से जुड़े नियमों पर केंद्रित है।
