नई दिल्ली। करीब 35 साल पुराने कथित लोन फर्जीवाड़े के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व इंडियन बैंक शाखा प्रबंधक वी. बालाकृष्णन को बड़ी राहत देते हुए उनकी दोषसिद्धि रद्द कर दी है। अदालत ने कहा कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) अभियोजन पक्ष के आरोपों को विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करने में नाकाम रहा। शीर्ष अदालत ने मामले की जांच और आरोपों की संरचना पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला टिकने लायक ठोस आधार से रहित था।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 1 सितंबर को फैसला सुनाते हुए निचली अदालत और उच्च न्यायालय के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें बालाकृष्णन को दोषी ठहराया गया था। अदालत ने कहा कि अभियोजन की ओर से पेश सामग्री आरोपी को कथित धोखाधड़ी या धन के दुरुपयोग से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं थी।
मामला 1991 का है, जब बालाकृष्णन चेन्नई स्थित इंडियन बैंक की अन्ना नगर शाखा में शाखा प्रबंधक के पद पर कार्यरत थे। CBI ने आरोप लगाया था कि उन्होंने इंडियन ओवरसीज बैंक के एक सेवानिवृत्त अधिकारी समेत अन्य आरोपियों के साथ मिलकर बैंक से कर्ज मंजूर कराने में नियमों का उल्लंघन किया। आरोप था कि कर्ज लेने वालों को वास्तविक कारोबारी के रूप में पेश किया गया, जबकि वे कथित तौर पर दूसरे आरोपी के परिचित या घरेलू कर्मचारी थे।
अभियोजन के अनुसार, एक आरोपी को रियल एस्टेट कारोबारी के रूप में पेश करते हुए ₹13.50 लाख का कर्ज मंजूर कराया गया। दूसरे मामले में 21.39 एकड़ जमीन खरीदने के लिए ₹10 लाख का कर्ज दिया गया। CBI ने दावा किया था कि कर्ज के लिए रखी गई संपत्तियों का मूल्य अधिक दिखाया गया और बैंक अधिकारी ने कथित मिलीभगत के तहत इन ऋणों को मंजूरी दी।
बालाकृष्णन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 और 120बी तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। मुकदमे के दौरान अभियोजन ने आरोप लगाया कि कर्ज की रकम का वास्तविक लाभ किसी अन्य आरोपी को मिला और बैंक को नुकसान पहुंचाने के लिए ऋण प्रक्रिया में हेरफेर किया गया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा के बाद इन दावों को आरोपी के खिलाफ पर्याप्त नहीं माना। अदालत ने कहा कि केवल यह आरोप कि किसी अन्य व्यक्ति ने संपत्तियां खरीदीं या कर्ज लेने वालों के नाम का इस्तेमाल किया, इससे यह साबित नहीं होता कि शाखा प्रबंधक भी धोखाधड़ी की साजिश में शामिल थे। पीठ ने अभियोजन की उन दलीलों को भी गंभीरता से लिया, जिनमें कर्ज लेने वालों की पहचान और संपत्तियों के मूल्यांकन को लेकर कई आरोप लगाए गए थे, लेकिन इनके समर्थन में ठोस और समकालीन दस्तावेज पेश नहीं किए गए।
अदालत ने विशेष रूप से संपत्तियों के मूल्यांकन से जुड़े साक्ष्यों पर सवाल उठाया। मामले में केवल एक मूल्यांकन प्रमाणपत्र पेश किया गया था। 1991-92 के दौरान संबंधित संपत्तियों के वास्तविक बाजार मूल्य को साबित करने के लिए समकालीन बिक्री विलेख या सरकारी निर्धारित दरों से जुड़े पर्याप्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं लाए गए। ये संपत्तियां बाद में वर्ष 2010 में नीलाम की गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने बैंक के स्तर पर सामने आए एक अलग मुद्दे पर भी चिंता जताई। अदालत के मुताबिक, नीलामी से प्राप्त रकम से संबंधित ऋण खातों को संतुष्ट करने के बाद कुछ अतिरिक्त राशि बची थी। पीठ ने सवाल उठाया कि यदि बैंक ने कर्ज की वसूली के बाद अतिरिक्त रकम अपने पास रखी, तो उसके वैध हकदारों को वह राशि क्यों नहीं दी गई।
शीर्ष अदालत ने इंडियन बैंक की अन्ना नगर शाखा के वर्तमान शाखा प्रबंधक से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इसमें संबंधित ऋण खातों, नीलाम की गई संपत्तियों, ऋण की अदायगी और नीलामी से प्राप्त अतिरिक्त रकम के इस्तेमाल का विवरण देने को कहा गया है। बैंक को संबंधित मूल दस्तावेज और संपत्तियों के स्वामित्व से जुड़े कागजात भी प्रस्तुत करने होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने बालाकृष्णन की अपील स्वीकार करते हुए उनकी दोषसिद्धि और पहले के दोनों अदालतों के आदेश रद्द कर दिए। यदि वह किसी अन्य मामले में आवश्यक नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया गया है। यदि वह जमानत पर हैं, तो उनके जमानत बंधपत्र समाप्त माने जाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को होगी।
