नई दिल्ली: भारत में डिजिटल भुगतान का दायरा तेजी से बढ़ने के साथ-साथ साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वित्त मंत्रालय द्वारा राज्यसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2022 से सितंबर 2025 तक देश में डिजिटल पेमेंट फ्रॉड के 5.83 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए, जिनमें लोगों को कुल ₹3,588.22 करोड़ का नुकसान हुआ। हालांकि, सबसे बड़ी चिंता यह है कि बैंक और वित्तीय संस्थान इस राशि में से केवल ₹238.83 करोड़, यानी करीब 6.6 प्रतिशत, ही वापस दिला सके।
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में क्रेडिट कार्ड और इंटरनेट बैंकिंग से जुड़े धोखाधड़ी के मामले सबसे अधिक सामने आए। क्रेडिट कार्ड से संबंधित 2,43,849 मामलों में ₹1,447.27 करोड़ की ठगी दर्ज की गई, जबकि इंटरनेट बैंकिंग से जुड़े 2,42,562 मामलों में सबसे अधिक ₹1,730.14 करोड़ की धोखाधड़ी हुई। दोनों श्रेणियां मिलकर कुल वित्तीय नुकसान का बड़ा हिस्सा बनाती हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि डिजिटल बैंकिंग सेवाएं साइबर अपराधियों के प्रमुख निशाने पर हैं।
डेबिट और एटीएम कार्ड से जुड़ी धोखाधड़ी तीसरे स्थान पर रही। इस श्रेणी में 94,991 मामलों में कुल ₹401.17 करोड़ की ठगी दर्ज की गई। इसके अलावा आधार इनेबल्ड पेमेंट सिस्टम (AePS) और आधार आधारित अन्य भुगतान माध्यमों से जुड़े 1,346 मामलों में ₹1.06 करोड़ की धोखाधड़ी सामने आई। वहीं वॉलेट, प्रीपेड कार्ड, IMPS, NEFT और RTGS जैसे अन्य डिजिटल भुगतान माध्यमों में भी धोखाधड़ी के मामले दर्ज हुए, हालांकि इनसे होने वाला वित्तीय नुकसान अपेक्षाकृत कम रहा।
दिलचस्प बात यह रही कि देश का सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) इस अवधि में अपेक्षाकृत सुरक्षित नजर आया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अध्ययन अवधि के दौरान UPI से जुड़े केवल 457 धोखाधड़ी के मामले दर्ज किए गए, जिनमें कुल ₹2.13 करोड़ की वित्तीय हानि हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि UPI प्लेटफॉर्म पर लगातार किए जा रहे सुरक्षा सुधार और रीयल-टाइम निगरानी तंत्र ने धोखाधड़ी के मामलों को सीमित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
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वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद को बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अप्रैल 2026 में डिजिटल भुगतान में धोखाधड़ी रोकने के लिए सुरक्षा उपायों पर एक चर्चा पत्र जारी किया था। इसमें विशेष रूप से ‘ऑथराइज्ड पुश पेमेंट (APP) फ्रॉड’ पर चिंता जताई गई है। इस प्रकार की धोखाधड़ी में अपराधी सोशल इंजीनियरिंग, फर्जी कॉल, नकली वेबसाइट, मैसेज या अन्य मनोवैज्ञानिक तरीकों से लोगों को स्वयं अपने खाते से धनराशि ट्रांसफर करने के लिए प्रेरित करते हैं। RBI ने ऐसे जोखिमों को कम करने के लिए अतिरिक्त प्रमाणीकरण, जोखिम आधारित निगरानी और संवेदनशील लेनदेन के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की सिफारिश की है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, आज अधिकांश साइबर वित्तीय धोखाधड़ी तकनीकी कमजोरी से अधिक मानव व्यवहार का फायदा उठाकर की जा रही है। उन्होंने कहा कि अपराधी लोगों में डर, लालच या जल्दबाजी पैदा कर उन्हें स्वयं भुगतान करने के लिए प्रेरित करते हैं। ऐसे मामलों में किसी भी अनजान कॉल, लिंक, क्यूआर कोड या भुगतान अनुरोध पर तुरंत भरोसा करने से बचना चाहिए और संदिग्ध लेनदेन की सूचना बिना देरी 1930 हेल्पलाइन या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज करानी चाहिए।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि साइबर धोखाधड़ी के प्रति जागरूकता अभियानों पर होने वाले कुल खर्च का कोई केंद्रीकृत रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद RBI, बैंक और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) लगातार जागरूकता कार्यक्रम चला रहे हैं। RBI अब तक 1,489 इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग अवेयरनेस एंड ट्रेनिंग (e-BAAT) कार्यक्रम आयोजित कर चुका है, जबकि बैंक और अन्य संस्थान टेलीविजन, प्रिंट मीडिया, एसएमएस और सोशल मीडिया के माध्यम से विशेष रूप से मनी म्यूल और डिजिटल पेमेंट फ्रॉड के खिलाफ जागरूकता अभियान चला रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी सुरक्षा के साथ-साथ नागरिकों में साइबर जागरूकता बढ़ाना ही डिजिटल भुगतान प्रणाली को सुरक्षित बनाने की सबसे प्रभावी रणनीति होगी।
