मुंबई: देशभर में डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के कथित बड़े नेटवर्क के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कार्रवाई तेज करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। एजेंसी की मनी लॉन्ड्रिंग जांच ऐसे नेटवर्क पर केंद्रित है, जिसमें करीब ₹30,000 करोड़ के बैंकिंग और नकद लेनदेन का संदेह है। अधिकारियों के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों की पहचान फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सैयद के रूप में हुई है। दोनों को 23 अगस्त को मुंबई से हिरासत में लिया गया।
ED की जांच की शुरुआत गोवा की एक महिला से कथित डिजिटल अरेस्ट के जरिए ₹2.60 करोड़ की ठगी के बाद हुई। आरोप है कि मई और जून 2025 के बीच साइबर अपराधियों ने महिला को तथाकथित “Secret Supervision Accounts” में रकम ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया। ठगों ने खुद को कानून लागू करने वाली एजेंसियों से जुड़ा अधिकारी बताकर उसे कथित आपराधिक मामले में फंसाने और गिरफ्तारी का डर दिखाया था।
PMLA कोर्ट में पेशी, गोवा ले जाने की तैयारी
ED ने 23 अगस्त को दोनों आरोपियों को मुंबई की विशेष PMLA अदालत में पेश किया। अदालत ने एजेंसी को ट्रांजिट रिमांड दी, जिसके बाद दोनों को गोवा ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। मामला गोवा में दर्ज होने के कारण एजेंसी सोमवार को पणजी की विशेष अदालत में दोनों को पेश कर कस्टोडियल पूछताछ के लिए रिमांड मांगने की तैयारी में थी।
जांच के दौरान एजेंसी को कथित तौर पर पता चला कि पीड़ित से ठगी गई रकम पहले कई बैंक खातों में पहुंचाई गई। इसके बाद रकम का एक हिस्सा नकद निकाला गया और फिर RBI से लाइसेंस प्राप्त मनी चेंजर्स के जरिए विदेशी मुद्रा में बदला गया। जांचकर्ता अब इस वित्तीय श्रृंखला के हर चरण की पड़ताल कर रहे हैं।
ED के सूत्रों के मुताबिक, साइबर अपराध नेटवर्क से जुड़े बैंक खातों में करीब ₹27,000 करोड़ के लेनदेन का संदेह है, जबकि लगभग ₹3,000 करोड़ के नकद लेनदेन की भी जांच की जा रही है। यह नेटवर्क करीब 300 पीड़ितों की शिकायतों और 20 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज 150 से 160 FIR से जुड़ा बताया जा रहा है।
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₹4,000 करोड़ की ठगी का अनुमान
जांच एजेंसी के अनुसार, इस नेटवर्क से जुड़े पीड़ितों से कथित तौर पर करीब ₹4,000 करोड़ की ठगी किए जाने का अनुमान है। यह आंकड़ा सामने आने वाली शिकायतों, FIR और वित्तीय लेनदेन की जांच के आधार पर आगे बदल सकता है।
ED ने इस मामले में जुलाई के दौरान गोवा और मुंबई में दो चरणों में तलाशी अभियान चलाया था। इसके बाद 21 अगस्त को भी ताजा कार्रवाई की गई। तलाशी के दौरान एजेंसी ने करीब ₹3.25 करोड़ नकद जब्त किए। अब जब्त रकम, बैंक रिकॉर्ड, कंपनियों के दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों की भूमिका खंगाली जा रही है।
ड्राइवर और कर्मचारियों को बनाया कंपनी का निदेशक
जांच में कथित शेल और डमी कंपनियों के संचालन का एक खास तरीका भी सामने आया है। एजेंसी को पता चला कि कुछ कंपनियों के निदेशक के तौर पर ऐसे ड्राइवर और कर्मचारी दर्ज थे, जो बेहद साधारण और छोटे आवासों में रहते थे। जांचकर्ताओं को संदेह है कि इन लोगों के नाम का इस्तेमाल कंपनियों और बैंक खातों को नियंत्रित करने तथा रकम के लेनदेन को छिपाने के लिए किया गया।
ऐसे मामलों में आमतौर पर वास्तविक संचालक पर्दे के पीछे रहते हैं, जबकि बैंक खाते और कंपनियां दूसरे लोगों के नाम पर संचालित की जाती हैं। ED अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन कंपनियों को किसने नियंत्रित किया और साइबर ठगी से हासिल रकम को किस तरह अलग-अलग स्तरों पर स्थानांतरित किया गया।
डिजिटल अरेस्ट में डर और वित्तीय दबाव सबसे बड़ा हथियार
प्रख्यात साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट गिरोह पहले पीड़ित को कानून, गिरफ्तारी और गंभीर अपराध में फंसने का डर दिखाकर मानसिक दबाव में लेते हैं। इसके बाद बैंक खातों की जानकारी लेकर रकम को तथाकथित जांच या सत्यापन के नाम पर दूसरे खातों में ट्रांसफर कराया जाता है। उन्होंने कहा कि “सीक्रेट अकाउंट”, “सुपरविजन अकाउंट” या किसी सरकारी जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने की मांग साइबर ठगी का बड़ा संकेत है।
उन्होंने कहा कि किसी भी एजेंसी का अधिकारी वीडियो कॉल पर बैंक खाते की रकम ट्रांसफर कराने या व्यक्ति को लंबे समय तक निगरानी में रखने का अधिकार नहीं रखता। ऐसे मामलों में पीड़ित को घबराने के बजाय तत्काल स्वतंत्र माध्यम से संबंधित एजेंसी से संपर्क करना चाहिए और वित्तीय लेनदेन रोककर साइबर अपराध की शिकायत दर्ज करानी चाहिए।
ED की जांच अब कथित नेटवर्क से जुड़े अन्य बैंक खातों, कंपनियों, मनी चेंजर्स और लाभार्थियों तक पहुंचने पर केंद्रित है। 300 से अधिक शिकायतों और 20 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज FIR के कारण मामले की जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
