नई दिल्ली। देश के 42 टोल प्लाजा पर अवैध सॉफ्टवेयर के जरिए करीब ₹120 करोड़ की कथित टोल टैक्स चोरी के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़ी कार्रवाई की है। धनशोधन के इस मामले में जांच एजेंसी ने उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और दिल्ली-एनसीआर में 14 ठिकानों पर छापेमारी की। कार्रवाई का उद्देश्य कथित गिरोह के वित्तीय लेनदेन, अवैध संपत्तियों और धनशोधन से जुड़े नेटवर्क के बारे में साक्ष्य जुटाना है।
यह मामला उत्तर प्रदेश विशेष कार्य बल (एसटीएफ) की उस जांच से जुड़ा है, जिसमें पिछले साल मिर्जापुर के अतरौला टोल प्लाजा पर छापेमारी के दौरान कथित टोल चोरी के नेटवर्क का खुलासा हुआ था। एसटीएफ की कार्रवाई के बाद दर्ज प्राथमिकी और जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर ईडी ने धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मामला दर्ज किया। इसके बाद एजेंसी ने टोल संचालन से जुड़े लोगों और कथित नेटवर्क के वित्तीय लेनदेन की जांच शुरू की।
जांच के केंद्र में वाराणसी निवासी आलोक सिंह है। उसे इस नेटवर्क का मुख्य सरगना बताया जा रहा है। वह प्रोग्रामर है और पहले टोल प्लाजा पर काम कर चुका है। आरोप है कि टोल व्यवस्था और उसके संचालन की जानकारी का फायदा उठाकर उसने ऐसा अवैध सॉफ्टवेयर तैयार किया, जिसके जरिए टोल से वसूली गई रकम का एक हिस्सा सरकारी खाते में जाने के बजाय कथित तौर पर गिरोह से जुड़े निजी बैंक खातों में भेजा जाता था।
जांच के मुताबिक, आलोक सिंह ने टोल संचालकों और कर्मचारियों के साथ कथित मिलीभगत कर अलग-अलग राज्यों में इस अवैध व्यवस्था को स्थापित कराया। नेटवर्क का विस्तार 14 राज्यों के 42 टोल प्लाजा तक होने की बात सामने आई है। इनमें उत्तर प्रदेश के नौ, मध्य प्रदेश के छह, राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ के चार-चार, महाराष्ट्र और झारखंड के तीन-तीन तथा पंजाब, असम और पश्चिम बंगाल के दो-दो टोल प्लाजा शामिल बताए गए हैं। जम्मू-कश्मीर, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना में भी एक-एक टोल प्लाजा इस नेटवर्क से जुड़े होने का आरोप है।
कथित धोखाधड़ी के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की आधिकारिक टोल व्यवस्था के समानांतर निजी सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया। जांच में ‘मॉबडाटा’ और ‘एनी’ नामक सॉफ्टवेयर का उल्लेख सामने आया है। आरोप है कि इनसे वाहनों की आवाजाही दर्ज की जाती थी और चालकों को टोल भुगतान की रसीद भी दी जाती थी, लेकिन संबंधित लेनदेन का पूरा विवरण सरकारी अभिलेख और अधिकृत बैंकिंग व्यवस्था में दर्ज नहीं होता था।
गिरोह कथित तौर पर ऐसे वाहनों को निशाना बनाता था जिनमें फास्टैग नहीं था या फास्टैग में पर्याप्त राशि उपलब्ध नहीं थी। ऐसे वाहनों से नियमों के अनुसार अधिक टोल वसूला जा सकता है। आरोप है कि अवैध सॉफ्टवेयर इन वाहनों के लिए वास्तविक रसीद जैसी दिखने वाली पर्चियां तैयार कर देता था। चालक को भुगतान की रसीद मिल जाने के कारण उसे लेनदेन में किसी गड़बड़ी का संदेह नहीं होता था, जबकि कथित तौर पर पूरी रकम सरकारी खाते तक नहीं पहुंचती थी।
मिर्जापुर के अतरौला टोल प्लाजा की जांच ने इस नेटवर्क को सामने लाने में अहम भूमिका निभाई। आरोप है कि वहां इस तरीके से एनएचएआई को रोजाना करीब ₹45,000 के राजस्व का नुकसान हो रहा था। कार्रवाई के बाद टोल संचालन से जुड़ी कंपनी शिवा बिल्डटेक को ब्लैकलिस्ट किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
ईडी की मौजूदा कार्रवाई में अब केवल टोल चोरी से हुए राजस्व नुकसान की जांच तक मामला सीमित नहीं है। एजेंसी यह भी पता लगाने में जुटी है कि कथित तौर पर सरकारी राजस्व से हासिल रकम किन बैंक खातों में पहुंची, उसे किन लोगों के बीच बांटा गया और उससे कौन-कौन सी संपत्तियां या अन्य परिसंपत्तियां खरीदी गईं। छापेमारी के दौरान मिले दस्तावेज, डिजिटल उपकरण, बैंकिंग रिकॉर्ड और अन्य वित्तीय साक्ष्य जांच की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
ईडी अब कथित गिरोह के पूरे वित्तीय नेटवर्क, टोल संचालकों की भूमिका और अवैध सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से जुड़े लेनदेन की कड़ियां जोड़ रही है। मामले में आगे की कार्रवाई बरामद साक्ष्यों और जांच के दौरान सामने आने वाले वित्तीय रिकॉर्ड के आधार पर की जाएगी।
