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Home»Inspiration»27 साल बाद फिर पहनी वर्दी: साधु बने सीआरपीएफ जवान की कानूनी लड़ाई का हुआ अंत
Inspiration

27 साल बाद फिर पहनी वर्दी: साधु बने सीआरपीएफ जवान की कानूनी लड़ाई का हुआ अंत

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksSeptember 3, 2026No Comments5 Mins Read
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1999 में बर्खास्तगी के बाद करीब दो दशक तक साधु जीवन बिताया; 54 साल की उम्र में गिरवर सिंह तोमर ने बीजापुर में 85वीं बटालियन के साथ फिर संभाली ड्यूटी
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बीजापुर/मुरैना। करीब 27 साल पहले सीआरपीएफ की वर्दी से अलग हुए गिरवर सिंह तोमर ने आखिरकार फिर सक्रिय सेवा में वापसी कर ली है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के छिछावली गांव निवासी 54 वर्षीय तोमर ने अगस्त 2026 में छत्तीसगढ़ के बीजापुर स्थित सीआरपीएफ की 85वीं बटालियन में ड्यूटी संभाली। उनकी वापसी करीब तीन दशक तक चली कानूनी लड़ाई और इसी दौरान बिताए साधु जीवन की असाधारण कहानी का परिणाम है।
तोमर 1991 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में भर्ती हुए थे। करीब आठ साल की सेवा के बाद 21 अक्टूबर 1999 को एक वरिष्ठ अधिकारी से जुड़े विवाद के चलते विभागीय कार्रवाई के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। तोमर का कहना था कि उनके खिलाफ लगाया गया मुख्य आरोप गलत था। उनके मुताबिक, उन पर वरिष्ठ अधिकारी के वाहन को साइकिल से टक्कर मारने का आरोप लगाया गया था, जिसे उन्होंने स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उनका दावा था कि आरोप का विरोध करने के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई और कठोर हो गई।
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, तोमर को जुलाई 1999 में आरोपपत्र दिया गया था। विभागीय अपील और उसके बाद पुनरीक्षण याचिका भी वर्ष 2000 में खारिज हो गई। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यहीं से उनकी लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई, जो ढाई दशक से अधिक समय तक चली।
10 अप्रैल 2007 को इलाहाबाद हाई कोर्ट की एकल पीठ ने तोमर को राहत दी। अदालत ने माना कि यदि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तब भी बर्खास्तगी की सजा कथित कदाचार की तुलना में अत्यधिक और असंगत थी। हालांकि इस फैसले के बाद भी उनकी तत्काल सेवा बहाल नहीं हुई।
केंद्र सरकार और सीआरपीएफ ने फैसले के खिलाफ विशेष अपील दायर की और रोक हासिल कर ली। इसके बाद मामला वर्षों तक लंबित रहा। इस दौरान तोमर के सामने यह अनिश्चितता बनी रही कि वे दोबारा कभी वर्दी पहन पाएंगे या नहीं।
कानूनी लड़ाई के बीच तोमर का जीवन पूरी तरह बदल गया। करीब 2001 में मुरैना लौटने के बाद उन्होंने निर्मोही अखाड़े से जुड़कर साधु जीवन अपना लिया। वे बाबा गिरवर दास और बाद में गिरवरदास महाराज के नाम से पहचाने जाने लगे। शुरुआत में उन्होंने अपने गांव के पास बरहद्वारी मंदिर में समय बिताया। इसके बाद करीब दो दशक तक मुरैना के गुफा मंदिर में रहे।
मंदिर में उनका जीवन पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियों के बीच गुजरता रहा, लेकिन उन्होंने अदालत में चल रही लड़ाई को नहीं छोड़ा। सुनवाई या कानूनी प्रक्रिया के दौरान जरूरत पड़ने पर वे अदालत पहुंचते रहे। इस तरह उनका जीवन दो अलग-अलग भूमिकाओं के बीच चलता रहा—एक तरफ साधु के रूप में धार्मिक जीवन और दूसरी तरफ पुरानी नौकरी वापस पाने का संघर्ष।

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25 अगस्त को तोमर अपनी नई तैनाती के लिए मुरैना से ट्रेन से बीजापुर रवाना हुए। अगले दिन वहां पहुंचने के बाद उन्होंने सबसे पहले लंबे बाल और सफेद दाढ़ी कटवाई, जो साधु जीवन के दौरान उनकी पहचान बन चुके थे। इसके बाद भगवा वस्त्र उतारकर उन्होंने सीआरपीएफ की खाकी वर्दी, टोपी और जूते पहने और दोबारा बल की जिम्मेदारी संभाली।
उनकी सेवा बहाली की दिशा में निर्णायक कदम अगस्त 2025 में आया। इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की अपील का निपटारा करते हुए तोमर को तीन महीने के भीतर सेवा में वापस लेने का निर्देश दिया। हालांकि दो दशक से अधिक पुराने मामले से जुड़े रिकॉर्ड जुटाने और विभागीय प्रक्रिया पूरी करने में समय लगा। अंततः करीब एक साल बाद सीआरपीएफ ने उन्हें सेवा में वापस लेने के आदेश जारी किए और 85वीं बटालियन, बीजापुर में तैनाती दी।
सेवा में लौटने के बाद तोमर ने इसे भावनात्मक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह सब ईश्वर की कृपा से संभव हुआ और ऐसा महसूस हो रहा है जैसे वे अपने घर लौट आए हों। उन्होंने बताया कि उनके पुराने दौर के केवल एक-दो कर्मचारी ही अब सेवा में हैं, लेकिन नए साथियों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।
वर्दी में लौटने के बावजूद तोमर अपने साधु जीवन को अतीत का ऐसा अध्याय नहीं मानते जिसे पूरी तरह पीछे छोड़ दिया जाए। आध्यात्मिक जीवन उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। इस दौरान उनका परिवार से भी संबंध बना रहा। उनकी पत्नी मंजू देवी और चार बच्चे हैं। बेटियां शिवानी और राधा विवाहित हैं। एक बेटा अभिषेक भारतीय वायु सेना में कार्यरत है, जबकि दूसरे बेटे का नाम कृष्ण है।
अब तोमर पदोन्नति और सेवा से जुड़े उन लाभों को हासिल करने के लिए भी प्रयास करना चाहते हैं, जो उनके अनुसार बर्खास्तगी के कारण प्रभावित हुए। 1991 में सीआरपीएफ में भर्ती होने से लेकर 1999 में बर्खास्तगी, फिर करीब दो दशक तक साधु जीवन और आखिरकार 2026 में उसी बल में वापसी तक का उनका सफर बेहद असाधारण है।
54 साल की उम्र में दोबारा खाकी पहनना तोमर के लिए केवल नौकरी पर लौटना नहीं है। यह उस करियर की वापसी है, जिसे उन्होंने 27 साल की कानूनी लड़ाई, लंबी प्रतीक्षा और अनिश्चितता के बावजूद छोड़ने से इनकार कर दिया।
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