बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु-मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर (बीएमआईसी) परियोजना को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि यह मामला राज्य के सबसे बड़े घोटालों में से एक हो सकता है। अदालत ने परियोजना के लिए किए गए भूमि अधिग्रहण, किसानों को वर्षों तक मुआवजा नहीं मिलने और अधिग्रहित जमीन के कथित व्यावसायिक इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इसके साथ ही परियोजना का फोरेंसिक ऑडिट कराने और स्वतंत्र विशेषज्ञों की विशेष टीम से पूरे मामले की जांच कराने का सुझाव भी दिया है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने लगभग 23 वर्ष पहले जारी भूमि अधिग्रहण अधिसूचनाओं को रद्द करने संबंधी एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि प्रभावित किसानों को संविधान के अनुच्छेद 300ए के तहत मिलने वाला वैधानिक मुआवजा नहीं दिया गया। अदालत ने टिप्पणी की कि पीढ़ियों से अपनी जमीन पर निर्भर किसानों की आजीविका प्रभावित हुई, जबकि परियोजना से सबसे अधिक लाभ इसके प्रवर्तकों को मिला।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब परियोजना अपने मूल स्वरूप में पूरी नहीं हो सकी, तब राज्य सरकार ने इसकी समीक्षा करने या इसे समाप्त करने पर विचार क्यों नहीं किया। न्यायालय के अनुसार, परियोजना के तहत प्रस्तावित 111 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे और पांच सैटेलाइट टाउनशिप का निर्माण निर्धारित योजना के अनुरूप नहीं हुआ, जबकि अधिग्रहित भूमि का बड़े पैमाने पर अन्य व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाने के संकेत सामने आए हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष रखे गए दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए कहा गया कि सार्वजनिक अवसंरचना परियोजना के लिए अधिग्रहित जमीन पर आवासीय परियोजनाएं, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, टेक पार्क और होटल विकसित किए गए। अदालत ने यह भी कहा कि परियोजना से जुड़ी कंपनी द्वारा परिधीय सड़कों पर टोल वसूला जा रहा है और कथित तौर पर बिना सरकारी मंजूरी के टोल दरों में वृद्धि भी की गई, जो विकास समझौते के प्रावधानों के अनुरूप नहीं दिखाई देती।
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न्यायालय ने कहा कि मामले में संभावित आपराधिक पहलुओं की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। इसके लिए स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक विशेष टीम गठित कर परियोजना से जुड़े वित्तीय लेनदेन और खातों का फोरेंसिक ऑडिट कराया जाना चाहिए। हालांकि अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि उसे संदेह है कि राज्य सरकार इस दिशा में प्रभावी कार्रवाई करेगी। अदालत के अनुसार, यदि अधिग्रहित भूमि का उपयोग मूल सार्वजनिक उद्देश्य से हटकर निजी लाभ के लिए किया गया है, तो इसकी विस्तृत जांच अनिवार्य है।
यह मामला परियोजना प्रवर्तक कंपनी द्वारा जुलाई 2025 में पारित उस आदेश को चुनौती देने के बाद हाईकोर्ट पहुंचा था, जिसमें एकल पीठ ने कर्नाटक इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट बोर्ड (केआईएडीबी) के माध्यम से अधिग्रहित कई एकड़ निजी भूमि से संबंधित अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया था। एकल पीठ ने माना था कि प्रारंभिक और अंतिम अधिसूचनाएं जारी होने के बावजूद वर्षों तक न तो अवार्ड पारित किया गया और न ही प्रभावित भूमि मालिकों को मुआवजा दिया गया।
अपील में परियोजना कंपनी ने दलील दी कि अंतिम अधिसूचना जारी होने और भूमि का कब्जा लिए जाने के बाद उसका स्वामित्व राज्य में निहित हो गया था तथा संबंधित कानून में अवार्ड पारित करने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि किसी कानून में समय सीमा का उल्लेख न होना सरकार को अनिश्चितकाल तक मुआवजा टालने का अधिकार नहीं देता। ऐसा करना संविधान द्वारा प्रदत्त संपत्ति के अधिकार को केवल औपचारिकता बनाकर छोड़ देगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला परियोजना की वैधता पर पूर्व में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों को चुनौती नहीं देता, बल्कि अधिग्रहण के बाद वैधानिक दायित्वों के लगातार उल्लंघन पर आधारित है। न्यायालय ने कहा कि प्रभावित भूमि मालिकों को उचित मुआवजा दिए बिना अधिग्रहण को वर्षों तक प्रभावी बनाए रखना कानून और संविधान दोनों की भावना के विपरीत है।
वर्ष 1995 में प्रस्तावित बेंगलुरु-मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर परियोजना के तहत 111 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे, परिधीय सड़कों और पांच सैटेलाइट टाउनशिप के विकास की योजना बनाई गई थी। परियोजना को दस वर्षों में पूरा किया जाना था और कंपनी को निर्धारित अवधि तक टोल वसूली का अधिकार दिया गया था। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार पिछले लगभग 25 वर्षों में प्रस्तावित मुख्य एक्सप्रेसवे का केवल लगभग पांच किलोमीटर हिस्सा ही तैयार हो सका है। हाईकोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी के बाद परियोजना की वित्तीय, प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर नई बहस शुरू होने की संभावना है।
