लखनऊ। डायबिटीज, हाई ट्राइग्लिसराइड्स और फैटी लिवर जैसी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली ‘लिपाग्लिन’ दवा के कथित नकली कारोबार की जांच में कई राज्यों तक फैले नेटवर्क के संकेत मिले हैं। जांच में दवा के बैच नंबर IB00327A की 9,610 स्ट्रिप गुजरात की दो अलग-अलग फर्मों को बेचे जाने का रिकॉर्ड सामने आया है। वहीं दस्तावेजों में 11,360 स्ट्रिप की खरीद लखनऊ की एक ऐसी फर्म से दिखाई गई, जिसका औषधि लाइसेंस और जीएसटी पंजीकरण पहले ही निरस्त हो चुका था।
मामले में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग (एफएसडीए) ने सर्वेश सिंह उर्फ मुन्ना भाई और राजस्थान की फर्म मेसर्स क्योरहेल्थ मेडिकोस के संचालक दुर्गेश कुमार के खिलाफ लखनऊ के अमीनाबाद थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई है। विभाग के मुताबिक, जांच में फर्जी अभिलेख, बिलिंग और निरस्त फर्म के नाम के कथित इस्तेमाल के जरिए दवाओं की खरीद-बिक्री किए जाने के तथ्य सामने आए हैं।
यह मामला केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (नॉर्थ जोन, गाजियाबाद) और राजस्थान के औषधि नियंत्रण अधिकारियों की संयुक्त जांच के दौरान सामने आया। एफएसडीए के सहायक मंडल आयुक्त ब्रजेश कुमार के अनुसार, जांच टीम ने राजस्थान स्थित क्योरहेल्थ मेडिकोस के लाइसेंस प्राप्त पते और परिसर की जांच की। मौके पर किसी भी प्रकार की दवा का भंडारण नहीं मिला। जांच में पता चला कि परिसर अब किसी दूसरे व्यवसाय के लिए किराए पर दिया जा चुका था।
इसके बाद जांच का रुख लखनऊ की मेसर्स बालाजी फार्मास्युटिकल्स की ओर हुआ। अभिलेखों में क्योरहेल्थ मेडिकोस द्वारा इसी फर्म से 11,360 स्ट्रिप लिपाग्लिन खरीदने की बात दर्ज थी। हालांकि, जांच में सामने आया कि बालाजी फार्मास्युटिकल्स का औषधि लाइसेंस और जीएसटी पंजीकरण पहले ही निरस्त किया जा चुका था। फर्म के पूर्व संचालक ने भी जांच अधिकारियों के सामने लिपाग्लिन की किसी तरह की बिक्री किए जाने से इनकार किया।
इससे जांच अधिकारियों के सामने बिल और वास्तविक आपूर्ति के बीच अंतर का सवाल खड़ा हुआ। एक तरफ अभिलेखों में निरस्त फर्म से बड़ी मात्रा में दवा की खरीद दिखाई गई थी, वहीं संबंधित फर्म के पूर्व संचालक ने ऐसी किसी बिक्री से इनकार किया। इसके बाद जांच टीम ने बिलिंग रिकॉर्ड, मोबाइल नंबरों और दवा की आपूर्ति से जुड़े अन्य दस्तावेजों की पड़ताल शुरू की।
जांच के दौरान क्योरहेल्थ मेडिकोस के संचालक दुर्गेश कुमार से वीडियो कॉल के माध्यम से पूछताछ की गई। विभाग के मुताबिक, उसने अधिकारियों को बताया कि उसे संबंधित दवाओं की आपूर्ति ‘मुन्ना भाई’ नामक व्यक्ति के माध्यम से की गई थी। जांच में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों की पड़ताल के दौरान उनकी कड़ियां सर्वेश सिंह और कुछ अन्य लोगों से जुड़ती मिलीं। इसके आधार पर जांच अधिकारियों ने फर्जी दस्तावेजों और बिलिंग के माध्यम से कथित तौर पर दवा के कारोबार का नेटवर्क संचालित किए जाने की दिशा में जांच आगे बढ़ाई।
जांच में इसी बैच नंबर IB00327A की 9,610 स्ट्रिप गुजरात की दो अलग-अलग फर्मों को बेचे जाने की जानकारी भी सामने आई है। इससे अधिकारियों को आशंका है कि कथित नकली दवा की आपूर्ति एक राज्य तक सीमित नहीं थी। लखनऊ, राजस्थान और गुजरात से जुड़े रिकॉर्ड सामने आने के बाद अब अन्य स्थानों पर भी इसी बैच की दवा की आपूर्ति और बिक्री की जांच की जा रही है।
एफएसडीए के अनुसार, इसी बैच की कथित नकली लिपाग्लिन दवा से जुड़े मामले में महाराष्ट्र के ठाणे में भी सर्वेश सिंह उर्फ मुन्ना सिंह समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ पहले से प्राथमिकी दर्ज है। इससे जांच को अंतरराज्यीय स्तर पर आगे बढ़ाने का आधार मिला है।
औषधि विभाग अब यह पता लगाने में जुटा है कि निरस्त लाइसेंस वाली फर्म के नाम पर कथित तौर पर बिल और दस्तावेज किसने तैयार किए, दवाओं की वास्तविक आपूर्ति कहां से हुई और अलग-अलग राज्यों में इन्हें किन माध्यमों से पहुंचाया गया। साथ ही, जांच एजेंसियां यह भी पता कर रही हैं कि इसी नेटवर्क ने अन्य दवाओं की आपूर्ति में भी ऐसे ही दस्तावेजों या फर्मों का इस्तेमाल किया था या नहीं। नकली दवा का मामला होने के कारण बरामद दवाओं और संबंधित बैच की भी नियमानुसार जांच की जा रही है।
