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Home»Development»अमरूद के ‘कागजी बागों’ ने रोकी एयरोट्रोपोलिस की रफ्तार: ₹147 करोड़ मुआवजा घोटाले ने पंजाब की सबसे महत्वाकांक्षी शहरी परियोजना को झकझोरा
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अमरूद के ‘कागजी बागों’ ने रोकी एयरोट्रोपोलिस की रफ्तार: ₹147 करोड़ मुआवजा घोटाले ने पंजाब की सबसे महत्वाकांक्षी शहरी परियोजना को झकझोरा

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksJune 23, 2026No Comments4 Mins Read
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फर्जी बाग, कथित रिकॉर्ड हेराफेरी और मुआवजा वितरण में अनियमितताओं के आरोपों के बीच वर्षों से अटकी विकास योजना; हजारों किसानों, निवेशकों और ट्राइसिटी क्षेत्र के निवासियों पर पड़ा असर, सरकार ने भुगतान और विकास प्रक्रिया फिर शुरू करने की कवायद तेज की
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चंडीगढ़। पंजाब की बहुचर्चित एयरोट्रोपोलिस परियोजना, जिसे राज्य के सबसे बड़े शहरी विकास अभियानों में गिना जाता है, एक कथित मुआवजा घोटाले के कारण लंबे समय से ठप पड़ी है। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आसपास विकसित किए जाने वाले इस महत्वाकांक्षी टाउनशिप प्रोजेक्ट को लेकर सामने आए कथित ‘अमरूद बाग घोटाले’ ने न केवल भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि हजारों किसानों, निवेशकों और संभावित घर खरीदारों को भी अनिश्चितता में डाल दिया है।

जानकारी के अनुसार, परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई जमीन पर कथित तौर पर ऐसे अमरूद के बाग दर्शाए गए, जो वास्तविकता में मौजूद नहीं थे या फिर मुआवजे के लिए पात्र परिपक्व बागों की श्रेणी में नहीं आते थे। आरोप है कि भूमि अधिग्रहण से पहले कुछ लोगों ने प्रभावित क्षेत्रों में जमीन खरीदी और बाद में रिकॉर्ड में बदलाव कर उन्हें परिपक्व फलदार बाग के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे मुआवजे की राशि कई गुना बढ़ गई।

जांच एजेंसियों के अनुसार, इस कथित नेटवर्क में संपत्ति कारोबारी भूपिंदर सिंह, विकास भंडारी, मुकेश जिंदल सहित कई अन्य लोगों की भूमिका सामने आई है। आरोप है कि भूमि रिकॉर्ड और बागों के मूल्यांकन से जुड़े दस्तावेजों में हेरफेर कर बड़ी मात्रा में मुआवजा हासिल किया गया। जांच में यह भी दावा किया गया कि कई भूखंडों पर सामान्य कृषि फसलें थीं, लेकिन रिकॉर्ड में उन्हें विकसित अमरूद बाग के रूप में दर्ज किया गया।

मामले की जांच के दौरान सामने आए आंकड़ों के अनुसार, 100 से अधिक लाभार्थियों को करोड़ों रुपये का मुआवजा जारी किया गया। जांच एजेंसियों का अनुमान है कि कथित अनियमित भुगतान का कुल मूल्य लगभग ₹147 करोड़ तक पहुंच सकता है। मामले में कई सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि वित्तीय लेनदेन और संपत्तियों की अलग से जांच जारी है।

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घोटाले का सबसे बड़ा असर उन किसानों पर पड़ा है जिनका इस कथित फर्जीवाड़े से कोई संबंध नहीं था। भूमि अधिग्रहण से जुड़े भुगतान और सत्यापन प्रक्रियाओं पर रोक लगने के कारण अनेक वास्तविक भूमि स्वामी वर्षों से अपने वैध मुआवजे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कई मामलों में संरचनाओं और बागों के मूल्यांकन से जुड़े भुगतान भी लंबित बताए जा रहे हैं।

एयरोट्रोपोलिस परियोजना वर्ष 2016 में शुरू की गई थी और इसे चंडीगढ़ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आसपास विकसित होने वाले बड़े आवासीय एवं वाणिज्यिक केंद्र के रूप में देखा गया था। योजना के तहत हजारों आवासीय इकाइयों, व्यावसायिक परिसरों और आधुनिक शहरी बुनियादी ढांचे का निर्माण प्रस्तावित था। हालांकि भूमि अधिग्रहण विवाद और जांच के कारण परियोजना के कई हिस्सों में विकास कार्य आगे नहीं बढ़ सके।

अब राज्य सरकार परियोजना को फिर गति देने के प्रयास में जुटी है। हाल में हुई बैठकों में लंबित मुआवजा राशि को न्यायालय के माध्यम से जमा कराने, विवादित और अविवादित दावों को अलग-अलग श्रेणियों में निपटाने तथा प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्य शुरू करने जैसे विकल्पों पर सहमति बनी है। इसके साथ ही बागों और संरचनाओं के मूल्यांकन के लिए अधिक पारदर्शी नीति तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि भूमि अधिग्रहण व्यवस्था में मौजूद संरचनात्मक कमजोरियों का संकेत है। उनका कहना है कि भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए ड्रोन सर्वेक्षण, उपग्रह चित्रों के आधार पर सत्यापन, डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधन और बहुस्तरीय जांच व्यवस्था को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

एयरोट्रोपोलिस परियोजना से जुड़े लाखों लोगों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बीच विकास कार्य कितनी जल्दी पटरी पर लौटते हैं। यह मामला पंजाब में भूमि अधिग्रहण, मुआवजा वितरण और शहरी विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता को एक बार फिर प्रमुखता से सामने लाया है।

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