नई दिल्ली। दहेज प्रथा पर रोक लगाने वाले कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और दहेज से जुड़े मामलों के जल्द निपटारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और हाईकोर्ट को अहम निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि दहेज मृत्यु और दहेज प्रताड़ना से जुड़े लंबित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सुना जाना चाहिए, ताकि पीड़ितों को लंबे समय तक न्याय की प्रतीक्षा न करनी पड़े।
सुप्रीम कोर्ट ने दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि कानून के बावजूद समाज में दहेज देने और लेने की प्रथा अब भी गहराई से मौजूद है। ऐसे में केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि न्यायपालिका, प्रशासन, कानून लागू करने वाली एजेंसियों और सामाजिक संगठनों को मिलकर लगातार प्रयास करने की जरूरत है।
लंबित दहेज मामलों को प्राथमिकता देने का निर्देश
अदालत ने दहेज मृत्यु और दहेज प्रताड़ना से संबंधित मामलों की सुनवाई करने वाली अदालतों को निर्देश दिया कि वे यथासंभव ऐसे मामलों को प्राथमिकता दें। कोशिश यह होनी चाहिए कि मामलों का निपटारा तेजी से हो, हालांकि इसके कारण दूसरे लंबित मामलों की सुनवाई पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने दहेज से जुड़े मामलों की निगरानी और प्रभावी कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को भी सक्रिय भूमिका निभाने को कहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामलों की संख्या कम करने के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि दहेज निषेध कानून का जमीन पर प्रभावी तरीके से पालन हो।
साल में तीन बार देनी होगी अनुपालन रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को दहेज से जुड़े मामलों की स्थिति और कानून के क्रियान्वयन को लेकर नियमित अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह रिपोर्ट हर साल 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को दाखिल करनी होगी।
यह व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक दहेज मृत्यु, दहेज प्रताड़ना और दहेज निषेध अधिनियम से संबंधित लंबित मामलों में पर्याप्त कमी नहीं आ जाती। रिपोर्ट के माध्यम से अदालत यह भी देखेगी कि संबंधित राज्य और न्यायिक संस्थाएं मामलों के जल्द निपटारे के लिए क्या कदम उठा रही हैं।
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जागरूकता अभियान चलाने पर भी जोर
अदालत ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को दहेज प्रथा और लैंगिक समानता को लेकर लगातार जागरूकता और संवेदनशीलता कार्यक्रम चलाने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि दहेज जैसी सामाजिक बुराई को केवल आपराधिक कानून के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज में जागरूकता बढ़ाना और दहेज के खिलाफ सामाजिक सोच विकसित करना भी जरूरी है।
अदालत ने दहेज निषेध कानून के क्रियान्वयन में सामने आने वाली समस्याओं को दूर करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। संबंधित अधिकारियों और संस्थाओं को यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने को कहा गया है कि शिकायतों और मामलों की जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी न हो।
पुराने फैसले के अनुपालन की समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्देश 20 अगस्त 2026 को जारी किए। अदालत की पीठ ने 15 दिसंबर 2025 को State of Uttar Pradesh vs Ajmal Beg मामले में दिए गए फैसले के अनुपालन की समीक्षा के दौरान यह दिशा-निर्देश जारी किए।
सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा को सामाजिक और कानूनी दोनों स्तरों पर गंभीर समस्या माना। अदालत ने संकेत दिया कि दहेज से जुड़े मामलों में प्रभावी कानून लागू करने के साथ-साथ लंबित मुकदमों को कम करना भी प्राथमिकता होनी चाहिए।
कानून के साथ सामाजिक बदलाव पर जोर
अदालत के निर्देशों का उद्देश्य दहेज से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना और कानून के अमल में आने वाली कमियों को दूर करना है। दहेज मृत्यु और प्रताड़ना के मामलों में समय पर जांच, सुनवाई और फैसला पीड़ित पक्ष के लिए महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि दहेज प्रथा के खिलाफ लड़ाई केवल अदालतों तक सीमित नहीं रह सकती। कानून लागू करने वाली एजेंसियों को प्रभावी कार्रवाई करनी होगी, न्यायालयों को मामलों के जल्द निपटारे पर ध्यान देना होगा और समाज में दहेज के खिलाफ लगातार जागरूकता पैदा करनी होगी।
