नई दिल्ली: देश में बढ़ती मादक पदार्थों की तस्करी और इसके फैलते नेटवर्क पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि ड्रग्स की तस्करी बेहद गंभीर समस्या है और इससे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए विभिन्न विशेष जांच एवं प्रवर्तन एजेंसियों को अलग-अलग तरीके से नहीं, बल्कि साझा रणनीति के तहत काम करना होगा। अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर मामले में जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष दाखिल याचिका में देश में मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामलों की जांच और सुनवाई के लिए एक समान व्यवस्था विकसित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के सामने यह मुद्दा रखा गया कि मौजूदा व्यवस्था में अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी और जांच प्रक्रिया में असमानता के कारण कई मामलों में कार्रवाई अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाती।
याचिका में ड्रग्स तस्करी के मामलों की जांच के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करने और जांच पूरी करने के लिए निश्चित समय-सीमा तय करने की मांग की गई है। इसके अलावा मामलों की सुनवाई के लिए भी एक समान मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP बनाए जाने की आवश्यकता बताई गई है। याचिका में कहा गया है कि जांच से लेकर फोरेंसिक परीक्षण और अदालत में सुनवाई तक पूरी प्रक्रिया के लिए स्पष्ट मानक होने से मामलों में होने वाली देरी को कम किया जा सकता है।
2025 में 53 फीसदी बढ़ोतरी का दावा
याचिका में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में देश में ड्रग्स से जुड़े मामलों में 53 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इसी अवधि में करीब 1,240 टन मादक पदार्थों की जब्ती का भी दावा किया गया है। याचिका के मुताबिक ये आंकड़े देश में नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार के बढ़ते दायरे और उससे उत्पन्न चुनौती की गंभीरता को दर्शाते हैं।
याचिका में ड्रग्स के सामाजिक प्रभाव को भी प्रमुखता से उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि मादक पदार्थों की लत केवल किसी एक व्यक्ति को प्रभावित नहीं करती, बल्कि उसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। लंबे समय तक नशे की गिरफ्त में रहने वाले लोगों के कारण परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति प्रभावित होती है। याचिका में इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था दोनों से जुड़ी गंभीर चुनौती बताया गया है।
जांच और फोरेंसिक व्यवस्था में खामियों का मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका में मौजूदा जांच व्यवस्था की कई कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया गया। इसमें कहा गया है कि अलग-अलग मामलों में जांच की प्रक्रिया और मानक एक जैसे नहीं हैं। फोरेंसिक जांच के लिए भी कई मामलों में समयबद्ध व्यवस्था नहीं होने से साक्ष्यों के परीक्षण में देरी होती है। इसका सीधा असर आरोपपत्र दाखिल करने और मुकदमे की आगे की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों की प्रकृति अक्सर अंतरराज्यीय और संगठित होती है। ऐसे मामलों में एक से अधिक एजेंसियों और राज्यों की भूमिका सामने आ सकती है। इसलिए सूचना साझा करने, संदिग्ध नेटवर्क की पहचान, वित्तीय लेनदेन की जांच और जब्त पदार्थों के फोरेंसिक परीक्षण के लिए एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।
पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र से जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से संकेत मिलता है कि मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ कार्रवाई में केवल गिरफ्तारी और जब्ती तक सीमित रहने के बजाय जांच, फोरेंसिक परीक्षण, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया के बीच बेहतर समन्वय पर भी जोर दिया जा सकता है। आने वाली सुनवाई में केंद्र के जवाब के बाद इस मामले में आगे की दिशा स्पष्ट होगी।
