नई दिल्ली: घर खरीदारों के अधिकारों को मजबूत करने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई रियल एस्टेट कंपनी दिवाला प्रक्रिया (Insolvency Proceedings) से गुजर रही है, तो उसके बिल्डर, प्रमोटर, निदेशक और व्यक्तिगत गारंटर केवल इस आधार पर कानूनी कार्रवाई से बच नहीं सकते कि कंपनी पर दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) लागू है। अदालत ने कहा कि IBC के तहत मिलने वाला संरक्षण केवल दिवालिया कंपनी (कॉरपोरेट डेब्टर) तक सीमित है और इसका लाभ उससे जुड़े व्यक्तियों को स्वतः नहीं मिल सकता।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन हजारों घर खरीदारों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जो वर्षों से अपने मकानों का कब्जा मिलने का इंतजार कर रहे हैं और जिनकी कानूनी कार्रवाई कई मामलों में डेवलपर कंपनियों के दिवाला प्रक्रिया में जाने के कारण प्रभावित हुई थी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से प्रमोटरों और निदेशकों की व्यक्तिगत जवाबदेही सुनिश्चित होगी तथा वे कॉरपोरेट दिवाला प्रक्रिया को अपने बचाव के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।
यह फैसला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बेंगलुरु स्थित मंत्री मान्यता एनर्जिया हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान दिया। वर्ष 2023 में इस परियोजना के घर खरीदारों ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) का रुख किया था। उनका आरोप था कि 31 दिसंबर 2018 तक मकानों का कब्जा देने का वादा किया गया था, लेकिन पूरा भुगतान करने के बावजूद उन्हें अब तक घर नहीं मिला।
बाद में डेवलपर कंपनी के कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में जाने के बाद IBC की धारा 14 के तहत लागू मोराटोरियम के कारण उपभोक्ता आयोग में चल रही कार्यवाही पर रोक लग गई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह प्रश्न आया कि क्या यह संरक्षण केवल कंपनी तक सीमित है या फिर उसके प्रमोटरों, निदेशकों और अन्य संबंधित व्यक्तियों को भी इसका लाभ मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि धारा 14 के तहत लागू मोराटोरियम का दायरा सीमित है और इसका उद्देश्य केवल दिवालिया कंपनी को संरक्षण देना है। जब तक संसद कानून में स्पष्ट रूप से कोई प्रावधान नहीं करती, तब तक इस संरक्षण का विस्तार प्रमोटरों, निदेशकों, शेयरधारकों, व्यक्तिगत गारंटरों या अन्य संबंधित व्यक्तियों तक नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही मोराटोरियम के दौरान दिवालिया कंपनी के खिलाफ कार्यवाही अस्थायी रूप से स्थगित हो जाए, लेकिन इससे प्रमोटरों या निदेशकों की स्वतंत्र कानूनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। इसलिए घर खरीदार और अन्य प्रभावित पक्ष कानून के अनुसार ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ अपनी कानूनी कार्रवाई जारी रख सकते हैं।
Registration Begins for FutureCrime Summit 2026, India’s Largest Cybercrime Conference
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले का रियल एस्टेट क्षेत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। वर्षों से अधूरी परियोजनाओं और दिवाला प्रक्रिया के कारण हजारों खरीदार अपने घर और निवेश दोनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब प्रमोटरों और निदेशकों के खिलाफ अलग से कार्रवाई जारी रखने का रास्ता खुलने से जवाबदेही बढ़ेगी और उपभोक्ताओं के हितों को अधिक मजबूती मिलेगी।
भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) की वर्ष 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिवाला कानून के तहत प्राप्त 5,785 शिकायतों में 43.9 प्रतिशत शिकायतें घर खरीदारों की थीं, जो इस व्यवस्था के तहत सबसे बड़ा प्रभावित वर्ग है। इससे स्पष्ट होता है कि रियल एस्टेट क्षेत्र में दिवाला प्रक्रिया का सबसे अधिक प्रभाव आम खरीदारों पर पड़ता है।
रियल एस्टेट क्षेत्र में दिवाला प्रक्रिया अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक जटिल मानी जाती है, क्योंकि इसमें केवल बैंक और वित्तीय संस्थान ही नहीं, बल्कि हजारों घर खरीदार भी हितधारक होते हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2025 तक देश में रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े 221 दिवाला मामलों में लगभग 1.09 लाख घर खरीदार प्रभावित थे। इनमें से कई परियोजनाएं वित्तीय और कानूनी अड़चनों के कारण वर्षों से अधूरी पड़ी हैं।
विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया है कि वर्तमान IBC व्यवस्था में दिवाला समाधान पूरी कंपनी के स्तर पर किया जाता है, न कि किसी एक परियोजना के आधार पर। इसके कारण कई बार आर्थिक रूप से व्यवहार्य परियोजनाएं भी प्रभावित हो जाती हैं। इसलिए लंबे समय से परियोजना-आधारित दिवाला समाधान प्रणाली लागू करने की मांग की जा रही है, ताकि अधूरी परियोजनाओं को तेजी से पूरा किया जा सके और घर खरीदारों के हितों की अधिक प्रभावी ढंग से सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला रियल एस्टेट क्षेत्र में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे घर खरीदारों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास और मजबूत होगा तथा यह सुनिश्चित होगा कि दिवाला प्रक्रिया किसी भी व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी से बचने का माध्यम न बन सके।
