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Home»राष्ट्रीय»सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा PMC बैंक-यूनिटी SFB विलय, करोड़ों जमाकर्ताओं को राहत; भुगतान योजना पर भी लगी मुहर
राष्ट्रीय

सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा PMC बैंक-यूनिटी SFB विलय, करोड़ों जमाकर्ताओं को राहत; भुगतान योजना पर भी लगी मुहर

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksJuly 13, 2026No Comments4 Mins Read
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बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज; आरबीआई ने कहा- ₹6,000 करोड़ की नकारात्मक नेटवर्थ के चलते विलय ही सबसे व्यावहारिक विकल्प था। 84% जमाकर्ताओं को पूरी राशि लौटाने का दावा, शेष को तय योजना के अनुसार भुगतान जारी रहेगा।
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नई दिल्ली: देश के चर्चित पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव (PMC) बैंक संकट से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बैंक के यूनिटी स्मॉल फाइनेंस बैंक (Unity Small Finance Bank) में विलय को बरकरार रखते हुए बड़ी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की पुनर्गठन और विलय योजना को वैध माना गया था। इसके साथ ही उन याचिकाओं को भी खारिज कर दिया गया, जिनमें ₹5 लाख से अधिक जमा रखने वाले ग्राहकों के चरणबद्ध भुगतान पर आपत्ति जताई गई थी।

अदालत में सुनवाई के दौरान आरबीआई ने कहा कि जब PMC बैंक का पुनर्गठन किया गया, उस समय उसकी नेटवर्थ लगभग ₹6,000 करोड़ नकारात्मक हो चुकी थी। नियामक के अनुसार यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया जाता, तो बैंक की वित्तीय स्थिति और बिगड़ सकती थी तथा जमाकर्ताओं के हितों को गंभीर नुकसान पहुंचता। ऐसे में यूनिटी स्मॉल फाइनेंस बैंक में विलय सबसे उपयुक्त और व्यवहारिक समाधान था।

PMC बैंक कभी देश के प्रमुख शहरी सहकारी बैंकों में गिना जाता था। वर्ष 1984 में स्थापित इस बैंक ने महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में अपना नेटवर्क विकसित किया और लाखों ग्राहकों का विश्वास हासिल किया। हालांकि बाद के वर्षों में बैंक के वित्तीय लेनदेन को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए। जांच में आरोप लगा कि हाउसिंग डेवलपमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (HDIL) समूह को बिना पर्याप्त सुरक्षा के हजारों करोड़ रुपये के ऋण दिए गए और इन ऋणों को छिपाने के लिए बैंक रिकॉर्ड में कथित हेरफेर की गई।

बताया गया कि वर्ष 2004 से 2019 के बीच बैंक ने कथित तौर पर हजारों फर्जी या डमी खातों के माध्यम से वास्तविक ऋणों को छिपाया। आरोपों के अनुसार HDIL समूह को करीब ₹4,355 करोड़ का ऋण दिया गया, जिसकी जानकारी नियामकीय निगरानी से छिपाने का प्रयास किया गया। सितंबर 2019 में मामला सामने आने के बाद आरबीआई ने PMC बैंक पर मॉरेटोरियम लागू कर दिया। शुरुआत में जमाकर्ताओं को केवल ₹1,000 निकालने की अनुमति दी गई, जिसे बाद में चरणबद्ध तरीके से बढ़ाकर ₹50,000 तक किया गया। इस दौरान लाखों ग्राहक अपनी जमा पूंजी तक पहुंच नहीं बना सके और कई परिवार गंभीर आर्थिक संकट में आ गए।

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बैंक के पुनर्गठन के लिए वर्ष 2021 में सेंट्रम फाइनेंशियल सर्विसेज और भारतपे के संयुक्त उपक्रम के रूप में यूनिटी स्मॉल फाइनेंस बैंक की स्थापना की गई। इसके बाद आरबीआई ने नवंबर 2021 में PMC बैंक के विलय का मसौदा जारी किया और हितधारकों से सुझाव मांगे। केंद्र सरकार ने जनवरी 2022 में इस योजना को मंजूरी दे दी, जिसके बाद PMC बैंक का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया और उसकी सभी शाखाएं तथा परिचालन यूनिटी स्मॉल फाइनेंस बैंक के अधीन आ गए।

विलय योजना के तहत ₹5 लाख तक की जमा राशि वाले अधिकांश ग्राहकों को अपेक्षाकृत शीघ्र भुगतान सुनिश्चित किया गया, जबकि इससे अधिक राशि रखने वाले जमाकर्ताओं के लिए चरणबद्ध भुगतान का प्रावधान किया गया। इसी व्यवस्था को चुनौती देते हुए कुछ जमाकर्ताओं ने अदालत का रुख किया था। उनका तर्क था कि पूरी जमा राशि प्राप्त करने में कई वर्ष लग रहे हैं, जिससे उन्हें वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

आरबीआई ने अदालत में बताया कि पुनर्गठन योजना के तहत अब तक करीब 84 प्रतिशत जमाकर्ताओं को उनकी पूरी जमा राशि लौटाई जा चुकी है। नियामक के अनुसार इन ग्राहकों को कुल ₹4,852.33 करोड़ का भुगतान किया गया है, जबकि शेष पात्र जमाकर्ताओं को भी स्वीकृत योजना के अनुरूप भुगतान जारी रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि PMC बैंक के पुनर्गठन और यूनिटी स्मॉल फाइनेंस बैंक में विलय की प्रक्रिया वैधानिक रूप से कायम रहेगी। यह निर्णय सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में नियामकीय हस्तक्षेप, जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा और संकटग्रस्त बैंकों के पुनर्गठन की प्रक्रिया के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।

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