नई दिल्ली: ऑनलाइन शिक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल ने अब एक नया और ज्यादा गंभीर रूप ले लिया है। पहले जहां छात्र चैटबॉट से निबंध या असाइनमेंट तैयार कराने तक सीमित थे, वहीं अब AI एजेंट कथित तौर पर छात्रों की जगह पूरी ऑनलाइन पढ़ाई और मूल्यांकन प्रक्रिया संभाल रहे हैं। ये एजेंट छात्र के अकाउंट में लॉग-इन होकर लेक्चर देखने, परीक्षा देने, असाइनमेंट तैयार करने और उसे जमा करने तक का काम कर सकते हैं। कुछ मामलों में AI एजेंट ऑनलाइन क्लास के चर्चा मंचों पर दूसरे छात्रों के साथ किताबों और पाठ्यक्रम से जुड़े विषयों पर बातचीत भी कर रहे हैं।
यह बदलाव ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था के लिए इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि इसमें AI सिर्फ लिखने में मदद करने वाला उपकरण नहीं रह जाता, बल्कि छात्र की जगह पूरी शैक्षणिक गतिविधि करने लगता है। इससे शिक्षकों के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो रहा है कि काम वास्तव में विद्यार्थी ने किया है या किसी AI एजेंट ने।
ऑनलाइन कक्षाओं में बढ़ रहा AI का इस्तेमाल
करीब दो दशक से ऑनलाइन पढ़ा रहीं प्रोफेसर करेन कोस्टा के अनुसार, छात्रों के काम में AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। उन्होंने बताया कि कई बार किसी छात्र की भाषा और लेखन शैली में अचानक आया बड़ा सुधार शिक्षक के लिए संदेह का कारण बनता है। हालांकि, ऑनलाइन कक्षाओं में इस तरह के संदेह को साबित करना और AI के इस्तेमाल को रोकना आसान नहीं है।
अमेरिका की 20 सार्वजनिक शोध विश्वविद्यालयों के 95,513 छात्रों पर किए गए एक अध्ययन में करीब एक-तिहाई छात्रों ने असाइनमेंट तैयार करने के लिए जनरेटिव AI के नियमित इस्तेमाल की बात स्वीकार की। यह आंकड़ा बताता है कि शिक्षा में AI का इस्तेमाल अब सीमित प्रयोग नहीं रह गया है और संस्थानों को मूल्यांकन के तरीकों पर दोबारा विचार करना पड़ रहा है।
परीक्षा में AI एजेंट की भूमिका से बढ़ी चिंता
AI एजेंटों की नई क्षमता ने शिक्षकों की चिंता और बढ़ा दी है। सामान्य चैटबॉट से किसी सवाल का जवाब या निबंध तैयार कराया जा सकता है, लेकिन AI एजेंट कई चरणों वाले काम को खुद पूरा करने में सक्षम होते हैं। छात्र उन्हें निर्देश देकर अपने ऑनलाइन खाते से काम कराने की कोशिश कर सकते हैं।
ऐसे में शिक्षक के सामने केवल यह सवाल नहीं रह जाता कि असाइनमेंट AI से लिखा गया है या नहीं, बल्कि यह पता लगाना भी चुनौती बन जाता है कि परीक्षा या ऑनलाइन पाठ्यक्रम में छात्र स्वयं मौजूद था भी या नहीं।
नकल रोकने के लिए बदल रहे परीक्षा के तरीके
AI आधारित नकल से निपटने के लिए कई शिक्षक और शिक्षण संस्थान पारंपरिक मूल्यांकन पद्धतियों की ओर लौट रहे हैं। कुछ जगहों पर ऑनलाइन परीक्षा के बजाय ऑफलाइन परीक्षा कराई जा रही है। मौखिक परीक्षा को भी महत्व दिया जा रहा है, ताकि विद्यार्थी से सीधे सवाल पूछकर यह समझा जा सके कि उसने विषय को वास्तव में समझा है या नहीं।
इसके अलावा छात्रों के टाइपिंग पैटर्न और असाइनमेंट तैयार करने की प्रक्रिया पर भी नजर रखने की कोशिश की जा रही है। प्रक्रिया आधारित असाइनमेंट में केवल अंतिम उत्तर के बजाय यह देखा जाता है कि छात्र ने समाधान तक पहुंचने के लिए कौन-कौन से चरण अपनाए।
डेनमार्क में भी अपनाया जा रहा सख्त तरीका
AI के जरिए नकल की बढ़ती आशंका के बीच डेनमार्क में भी परीक्षा व्यवस्था में बदलाव किए जा रहे हैं। वहां छात्रों से लिखित असाइनमेंट का मौखिक बचाव कराने और निगरानी वाली परीक्षाओं की संख्या बढ़ाने जैसे उपायों पर जोर दिया जा रहा है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विद्यार्थी ने जिस विषय पर काम जमा किया है, उसके बारे में उसे वास्तविक समझ भी है। केवल AI से तैयार सामग्री जमा कर देने से परीक्षा या पाठ्यक्रम पूरा करने की स्थिति को स्वीकार नहीं किया जाए।
सवाल सिर्फ नकल का नहीं, डिग्री की विश्वसनीयता का
शिक्षा विशेषज्ञों के सामने अब चुनौती केवल AI से नकल रोकने की नहीं है। यदि AI एजेंट छात्रों की जगह पढ़ाई, असाइनमेंट और परीक्षाएं करने लगते हैं, तो इससे डिग्री हासिल करने वाले व्यक्ति की वास्तविक योग्यता पर भी सवाल उठ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालयों को ऐसी मूल्यांकन प्रणाली विकसित करनी होगी जिसमें तकनीक का सकारात्मक इस्तेमाल जारी रहे, लेकिन विद्यार्थी की वास्तविक समझ और क्षमता की जांच भी सुनिश्चित हो। आने वाले समय में AI शिक्षा का हिस्सा बना रहेगा, लेकिन उसकी भूमिका और सीमाएं तय करना संस्थानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
