नई दिल्ली। अनिल अंबानी और रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े कथित बैंक ऋण घोटाले के मामलों को एक साथ लाने की केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पहल की है। केंद्र ने विभिन्न हाईकोर्ट में लंबित मामलों को दिल्ली हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने के लिए याचिका दायर की है। सरकार का कहना है कि अलग-अलग अदालतों में एक जैसे मामलों की सुनवाई से जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मामले की सुनवाई दो सप्ताह के लिए टाल दी। केंद्र को इस दौरान विभिन्न हाईकोर्ट में लंबित मामलों की विस्तृत जानकारी अदालत के समक्ष पेश करने को कहा गया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुरुआत में केंद्र की मांग पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट में मामलों की सुनवाई में कोई देरी नहीं हो रही है, इसलिए सरकार को वहां लंबित मामलों में पहले निर्णय हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि दिल्ली हाईकोर्ट से फैसला आने के बाद जरूरत पड़ने पर अन्य हाईकोर्ट में लंबित मामलों के निपटारे के लिए अलग कदम उठाए जा सकते हैं।
केंद्र की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने संविधान के अनुच्छेद 139A(2) का हवाला देते हुए कहा कि इसी प्रावधान का उद्देश्य एक जैसे मामलों को एक जगह लाकर उनके प्रभावी और शीघ्र निपटारे का रास्ता तैयार करना है। केंद्र ने दलील दी कि मामला काले धन से जुड़े कानून के तहत है और यदि कार्यवाही लंबे समय तक स्थगित रहती है तो विदेश में कथित रूप से जमा धन वापस लाने के उद्देश्य पर असर पड़ सकता है।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट में करीब 15 से 20 मामले लंबित हैं। इनमें पक्षकारों की दलीलें पूरी हो चुकी हैं और लिखित प्रस्तुतियां भी दाखिल की जा चुकी हैं। सरकार के अनुसार ये मामले अंतिम सुनवाई के लिए तैयार हैं। इसके विपरीत मुंबई हाईकोर्ट में संबंधित कार्यवाही आगे नहीं बढ़ पा रही है। केंद्र ने कहा कि अलग-अलग हाईकोर्ट में समान मुद्दों पर मामले लंबित रहने से एक ही विषय पर अलग-अलग स्तर पर सुनवाई चल रही है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह आशंका भी जताई कि यदि दिल्ली हाईकोर्ट के मामलों को स्थानांतरित करने की मांग स्वीकार की जाती है, तो दूसरी तरफ से मुंबई हाईकोर्ट में लंबित मामलों को दिल्ली से वहां भेजने की मांग उठ सकती है। इसके बाद केंद्र ने अदालत से दो सप्ताह का समय मांगा, ताकि सभी संबंधित मामलों की पूरी सूची और उनकी मौजूदा स्थिति प्रस्तुत की जा सके। सरकार ने साथ ही मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए विशेष निर्देश देने की मांग करने के संकेत दिए।
इस मामले के समानांतर सुप्रीम कोर्ट में अनिल धीरूभाई अंबानी समूह से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं की व्यापक जांच की मांग वाली जनहित याचिका भी लंबित है। याचिका में जांच की निगरानी अदालत से कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि मौजूदा जांच अलग-अलग हिस्सों में चल रही है और इसमें कथित तौर पर शामिल सभी पक्षों, बैंक अधिकारियों तथा सरकारी कर्मचारियों की भूमिका की पर्याप्त जांच नहीं हो रही।
जुलाई में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि समूह से जुड़े करीब ₹40,000 करोड़ के कथित ऋण घोटाले में तीन आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं। अदालत को यह भी बताया गया था कि समूह के एक वरिष्ठ प्रबंधकीय अधिकारी को गिरफ्तार किया गया है।
मामले की जांच कई प्राथमिकी के आधार पर की जा रही है। जांच एजेंसियों के अनुसार, समूह को दी गई ऋण आधारित और गैर-ऋण आधारित वित्तीय सुविधाओं का कथित तौर पर उस उद्देश्य के बजाय इस्तेमाल किया गया, जिसके लिए उन्हें मंजूर किया गया था। आरोप है कि नई ऋण सुविधाओं से पुराने घरेलू और विदेशी दायित्वों का भुगतान किया गया तथा रकम को अलग-अलग खातों और कंपनियों के माध्यम से घुमाकर पुराने कर्ज को बनाए रखने की व्यवस्था की गई।
प्रवर्तन एजेंसी ने आरोप लगाया है कि रकम को समूह की कंपनियों, कथित रूप से बनाई गई मध्यस्थ कंपनियों, कई बैंक खातों और तरल म्यूचुअल फंड के जरिए घुमाया गया। जांच में यह भी आरोप है कि कुछ रकम का इस्तेमाल पुराने विदेशी वाणिज्यिक ऋण और विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड से जुड़े दायित्वों की अदायगी में किया गया, जबकि लेनदेन को वैध कारोबारी खर्च या आय के रूप में दिखाया गया।
जांच एजेंसी के अनुसार, ऋण की रकम समूह की अन्य कंपनियों, जिनमें रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर और रिलायंस कैपिटल शामिल हैं, तक भी पहुंचाई गई। आरोप है कि रकम का एक हिस्सा विदेश में प्रवर्तकों से जुड़ी निजी संपत्तियों की खरीद में इस्तेमाल हुआ। एजेंसी ने कुछ लेनदेन के जरिए रिलायंस कम्युनिकेशंस के मुनाफे को कृत्रिम रूप से बढ़ाने का भी आरोप लगाया है।
जांच एजेंसी ने इस मामले में कथित अपराध से हासिल रकम का मूल्य करीब ₹40,185 करोड़ आंका है और लगभग ₹8,078 करोड़ की संपत्तियां कुर्क किए जाने की जानकारी दी है। अब सुप्रीम कोर्ट में दो सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई में केंद्र सरकार अलग-अलग हाईकोर्ट में लंबित मामलों का पूरा ब्योरा पेश करेगी। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि मामलों को एक जगह स्थानांतरित करने और उनके शीघ्र निपटारे के लिए क्या कदम उठाया जाए।
