मुंबई: वित्तीय धोखाधड़ी का दायरा अब किसी एक बैंक या वित्तीय संस्था तक सीमित नहीं रह गया है। साइबर अपराधी बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट, फिनटेक प्लेटफॉर्म और अलग-अलग डिजिटल एप्लिकेशन के बीच तेजी से पैसा स्थानांतरित कर रहे हैं। ऐसे में बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र के जोखिम विशेषज्ञों का मानना है कि फ्रॉड रोकने की रणनीति को बैंक-स्तरीय नियंत्रण से आगे बढ़ाकर पूरे वित्तीय तंत्र के लिए साझा इंटेलिजेंस और रियल-टाइम निगरानी पर आधारित करना होगा।
मुंबई में आयोजित ETBFSI CXO Conclave 2026 के आठवें संस्करण में वरिष्ठ जोखिम अधिकारियों ने कहा कि वित्तीय अपराध के तरीके लगातार अधिक संगठित और जटिल हो रहे हैं। ऐसे में संदिग्ध गतिविधियों की पहचान केवल लेनदेन पूरा होने के बाद करना पर्याप्त नहीं होगा। बैंकों और अन्य संस्थानों को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें संदिग्ध ग्राहक, म्यूल खाते, लाभार्थी, डिवाइस और लेनदेन से जुड़ी जानकारी साझा आधार पर उपलब्ध हो।
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के CGM RM-II अरुण पांडेय ने कहा कि अगर ठग संगठित तरीके से काम कर रहे हैं और बैंक अलग-अलग स्तर पर बंटे हुए हैं, तो मुकाबला बराबरी का नहीं रह जाएगा। उनके मुताबिक अपराधियों के लिए किसी एक संस्था की सीमाएं मायने नहीं रखतीं। ठगी की रकम एक बैंक खाते से वॉलेट, फिर किसी दूसरे एप्लिकेशन और अंततः अलग-अलग वित्तीय संस्थानों के खातों में पहुंच सकती है।
बैंक ऑफ बड़ौदा के GM और Deputy Risk Officer रामानुज शर्मा ने कहा कि साइबर अपराधियों का ध्यान केवल तकनीकी कमजोरियों पर नहीं है, बल्कि वे सीधे लोगों को निशाना बना रहे हैं। निवेश ठगी, डिजिटल अरेस्ट और सोशल इंजीनियरिंग जैसे मामलों में अपराधी लंबे समय तक पीड़ित को प्रभावित करते हैं। ऐसे मामलों से निपटने के लिए एआई आधारित पहचान प्रणाली के साथ ग्राहकों में जागरूकता और संस्थानों के बीच इंटेलिजेंस साझा करना जरूरी है।
जोखिम विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि संदिग्ध लेनदेन की पहचान कितनी जल्दी होती है, यह फ्रॉड नियंत्रण की प्रभावशीलता का महत्वपूर्ण पैमाना होना चाहिए। NaBFID के EVP-Risk भरन कुमार गंटुपल्ली ने चेताया कि एआई और साइबर सुरक्षा पर ध्यान बढ़ने के बावजूद पारंपरिक वित्तीय धोखाधड़ी के तरीकों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। कमजोर सत्यापन और बुनियादी नियंत्रणों की अनदेखी से पुराने तरीके फिर सक्रिय हो सकते हैं।
L&T Finance की CRO जीनत हमीरानी ने कहा कि अपराधी अपनी रणनीति वित्तीय संस्थानों की प्रक्रिया बदलने की गति से कहीं तेजी से बदल सकते हैं। इसलिए हर ग्राहक यात्रा को पूरी तरह बिना किसी रुकावट के रखना संभव नहीं है। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त सत्यापन जैसे सीमित ‘फ्रिक्शन’ ग्राहक की सुरक्षा के लिए जरूरी हो सकते हैं।
Axis Bank के Group Chief Risk Officer आनंद विश्वनाथन ने कहा कि जोखिम को क्रेडिट, साइबर, टेक्नोलॉजी या ऑपरेशनल श्रेणियों में अलग-अलग देखने के बजाय उसके अंतिम परिणाम के आधार पर समझना चाहिए। किसी धोखाधड़ी की शुरुआत क्रेडिट निर्णय, तकनीकी कमजोरी, प्रक्रिया की गलती या सूचना सुरक्षा की खामी से हो सकती है।
HDFC Bank के Sr. EVP-Credit Intelligence & Control मनीष अग्रवाल ने कहा कि संस्थानों के पास अक्सर पर्याप्त डेटा मौजूद होता है, लेकिन अलग-अलग सिस्टम में बंटे होने के कारण उसका प्रभावी इस्तेमाल नहीं हो पाता। फ्रॉड अलर्ट, AML संकेत, म्यूल अकाउंट की जानकारी, ग्राहक ऑनबोर्डिंग डेटा और लेनदेन निगरानी को साझा आर्किटेक्चर से जोड़ने की जरूरत है।
SAS India के Director-Customer Advisory डॉ. राधाकृष्ण बी. के मुताबिक फ्रॉड रोकने के लिए कोई एक मॉडल पर्याप्त नहीं है। नियम आधारित प्रणाली, विसंगति पहचान, एआई, मशीन लर्निंग और नेटवर्क एनालिटिक्स को साथ इस्तेमाल करना होगा। किसी ग्राहक, खाते, लाभार्थी, डिवाइस, व्यापारी, ATM या स्थान से जुड़े जोखिम संकेतों को जोड़कर लेनदेन पर फैसला किया जा सकता है।
AU Small Finance Bank के CRO अमोल पाध्ये ने एआई आधारित हमलों, डीपफेक, मॉडल जोखिम और स्वचालित निर्णयों से पैदा होने वाली नई चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। विशेषज्ञों के अनुसार आगे की रणनीति में बैंकों, फिनटेक कंपनियों, भुगतान प्लेटफॉर्म, नियामकों, दूरसंचार कंपनियों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच तेज सूचना साझाकरण अहम होगा। लक्ष्य यह है कि सामान्य ग्राहकों को सुविधा मिलती रहे, लेकिन संदिग्ध गतिविधियों पर सही समय और सही स्तर पर नियंत्रण लगाया जा सके।
