बेंगलुरु। कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) की पशु चिकित्सक भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच कर रही पुलिस ने 12 ऐसे अभ्यर्थियों की पहचान की है, जिन्होंने परीक्षा में नकल या अनुचित तरीके से मदद हासिल करने के लिए कथित तौर पर पैसे दिए थे। जांच में अब तक इन अभ्यर्थियों की ओर से मध्यस्थ को किए गए करीब ₹80 लाख के बैंक लेनदेन का पता चला है। मामले में पूछताछ के बाद जांच एजेंसियां अब अन्य अभ्यर्थियों और संदिग्धों की भूमिका भी खंगाल रही हैं।
यह कार्रवाई पूर्व परीक्षा नियंत्रक ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार और कथित मध्यस्थ बसवराज कन्नाले से करीब 10 दिनों तक हुई पूछताछ के बाद सामने आई है। दोनों को परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और 400 पशु चिकित्सक पदों की भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी के मामले में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस हिरासत की अवधि पूरी होने के बाद दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
जांच में सामने आया है कि कन्नाले को कथित तौर पर 24 अभ्यर्थियों से करीब ₹10 करोड़ की रकम मिली थी। प्रत्येक अभ्यर्थी से कथित तौर पर ₹30 लाख से ₹80 लाख तक लिए जाने की बात सामने आई है। इनमें से करीब ₹80 लाख के भुगतान का बैंक खातों के जरिए पता लगाया जा चुका है। जांच एजेंसियां अब बाकी रकम के लेनदेन और इससे जुड़े खातों की भी जांच कर रही हैं।
परीक्षा में असामान्य अंक से बढ़ा संदेह
मामले की प्राथमिकी के अनुसार, ऐसे 29 अभ्यर्थियों की पहचान हुई थी, जिनके कॉलेज परीक्षाओं में प्रदर्शन कमजोर रहा था, लेकिन भर्ती परीक्षा में उन्होंने 500 में से 450 से अधिक अंक हासिल किए। इससे परीक्षा प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी का संदेह गहरा हुआ। पशु चिकित्सक पदों के लिए करीब 1,400 अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी थी। परीक्षा तीन केंद्रों पर आयोजित हुई थी, जिनमें से 329 अभ्यर्थियों का चयन किया गया।
मामला एक पशु चिकित्सक की शिकायत के बाद जांच के दायरे में आया, जो परीक्षा में चयनित नहीं हो सके। इसके बाद जांच में आरोप सामने आया कि परीक्षा से एक दिन पहले कुछ चुनिंदा अभ्यर्थियों को प्रश्नपत्र कथित तौर पर उपलब्ध कराया गया था।
जांच एजेंसियों के अनुसार, कथित तौर पर लीक प्रश्नपत्र बेंगलुरु के आसपास स्थित रिसॉर्ट में ठहराए गए अभ्यर्थियों तक पहुंचाए गए थे। वहां उन्हें प्रश्नों के उत्तर तैयार करने और परीक्षा में उनका इस्तेमाल करने के लिए कथित तौर पर प्रशिक्षण दिया गया। आरोप यह भी है कि मध्यस्थों ने इन अभ्यर्थियों को परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने और परीक्षा के बाद वापस लाने की व्यवस्था संभाली थी।
एन्क्रिप्टेड माध्यमों से होती थी बातचीत
जांच में यह भी सामने आया है कि कथित रूप से शामिल लोगों के बीच बातचीत सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड माध्यमों के जरिए होती थी। जांचकर्ताओं के अनुसार, प्रश्नपत्र कुछ अभ्यर्थियों को हस्तलिखित और मुद्रित दोनों रूपों में उपलब्ध कराए जाने की आशंका है। अभ्यर्थियों के आने-जाने के लिए भी मध्यस्थों की ओर से परिवहन व्यवस्था किए जाने के संकेत मिले हैं।
जांच में बेंगलुरु के बाहरी इलाके देवनहल्ली स्थित एक रिसॉर्ट सहित उन स्थानों की पहचान किए जाने की बात सामने आई है, जहां कथित तौर पर अभ्यर्थियों को प्रश्नपत्र उपलब्ध कराए गए थे। साथ ही, उन बैंक खातों का भी पता लगाया जा रहा है, जिनमें अभ्यर्थियों से रकम भेजी गई थी।
तकनीकी जांच में भी अहम सुराग
जांच एजेंसियों ने इंटरनेट प्रोटोकॉल डिटेल रिकॉर्ड यानी आईपीडीआर के विश्लेषण के आधार पर पूर्व परीक्षा नियंत्रक गंगवार और अन्य आरोपियों के बीच कथित संपर्क की कड़ियां भी स्थापित की हैं। परीक्षा से पहले और बाद के संपर्कों की जांच के जरिए यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि प्रश्नपत्र लीक करने और अभ्यर्थियों तक पहुंचाने की पूरी व्यवस्था किस तरह संचालित हुई।
मामले में फरार चल रहे कुछ संदिग्धों के खिलाफ लुकआउट नोटिस भी जारी किए गए हैं। इनमें केपीएससी की सदस्य शांता होसामनी का नाम शामिल है, जिन पर कुछ अभ्यर्थियों से संपर्क करने और उन्हें कथित तौर पर प्रभावित करने का आरोप है।
निलंबित केपीएससी अध्यक्ष साहुकार एस. शिवशंकरप्पा की भूमिका की भी जांच चल रही है। उनकी अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं। जांच में उनके, उनके परिवार के कुछ सदस्यों और गिरफ्तार मध्यस्थ के बीच कथित संपर्क और बातचीत के संकेत मिलने की बात सामने आई है। पुलिस अब पूरे मामले में अभ्यर्थियों, मध्यस्थों, आयोग से जुड़े लोगों और वित्तीय लेनदेन की कड़ियों को जोड़कर कथित भर्ती घोटाले की पूरी संरचना सामने लाने में जुटी है।
