मुंबई। भारतीय कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में तकनीक आधारित बदलाव की दिशा में ‘डिमैट 2.0’ पायलट शुरू किया गया है। इस पहल के तहत कॉरपोरेट बॉन्ड को वितरित खाता प्रौद्योगिकी (डीएलटी) पर डिजिटल टोकन के रूप में दर्ज और निपटाया जाएगा। इसका उद्देश्य बॉन्ड जारी करने, खरीद-बिक्री और ब्याज व मूलधन के भुगतान की प्रक्रिया को तेज, स्वचालित और कम खर्चीला बनाना है।
यह पायलट भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड के अध्यक्ष तुहिन कांत पांडे ने मुंबई में आयोजित ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 के दौरान संयुक्त रूप से घोषित किया। व्यवस्था में बॉन्ड की कानूनी प्रकृति नहीं बदलेगी। निवेशकों के अधिकार, सुरक्षा और जारीकर्ता की भुगतान संबंधी जिम्मेदारी पहले की तरह लागू रहेगी।
डिमैट 2.0 में कॉरपोरेट बॉन्ड को साझा इलेक्ट्रॉनिक खाता-बही पर डिजिटल टोकन के रूप में बनाया जाएगा। इस खाता-बही का प्रबंधन बाजार अवसंरचना संस्थानों और डिपॉजिटरी के जरिए होगा। इससे प्रतिभूतियों के स्वामित्व और लेनदेन का रिकॉर्ड एक साझा डिजिटल व्यवस्था में दर्ज किया जा सकेगा।
इस व्यवस्था को आरबीआई की थोक डिजिटल मुद्रा ई-रुपये से यूनिफाइड मार्केट इंटरफेस के माध्यम से जोड़ा गया है। इसके जरिए ‘एटॉमिक सेटलमेंट’ की सुविधा मिलती है, जिसमें बॉन्ड और भुगतान एक ही समय पर स्थानांतरित किए जा सकते हैं। मौजूदा व्यवस्था में लेनदेन के दोनों हिस्सों के निपटान में अलग-अलग समय लग सकता है, जबकि नई व्यवस्था में इस अंतर को कम करने का लक्ष्य है।
डिमैट 2.0 के जरिए बॉन्ड से जुड़े ब्याज और मूलधन भुगतान को भी स्वचालित करने की योजना है। स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट निर्धारित शर्त पूरी होने पर भुगतान की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। तय तारीख पर ब्याज या मूलधन की राशि निवेशक के ई-रुपये वाले डिजिटल मुद्रा खाते में जमा की जा सकती है।
जारीकर्ताओं के लिए इसका एक प्रमुख लाभ धन मिलने की गति हो सकती है। मौजूदा प्रक्रिया में बोली और धन प्राप्त होने के बीच आम तौर पर दो से तीन दिन लग सकते हैं, जबकि नई व्यवस्था में उसी दिन धन उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। द्वितीयक बाजार में बॉन्ड बेचने वाले निवेशकों को भी बिक्री की राशि तुरंत मिलने की सुविधा मिल सकती है।
इस प्रणाली से बिचौलियों के लिए दस्तावेज साझा करने, आंकड़ों का मिलान करने और अलग-अलग रिकॉर्ड का सत्यापन करने का काम कम होने की उम्मीद है। इससे बॉन्ड जारी करने और उनकी सेवा से जुड़ी लागत में भी कमी आ सकती है।
पायलट चरण में ही तीन कंपनियों ने टोकन आधारित बॉन्ड के जरिए कुल ₹1,025 करोड़ जुटाए हैं। आरईसी ने 7 सितंबर को 18 निवेशकों से ₹500 करोड़ जुटाए। इसके बाद एलएंडटी ने 9 सितंबर को चार निवेशकों से ₹500 करोड़ और आईआईएफएल ने उसी दिन एक निवेशक से ₹25 करोड़ जुटाए। आरईसी का निर्गम नियामकीय सैंडबॉक्स व्यवस्था के तहत भारत का पहला पायलट टोकन आधारित कॉरपोरेट बॉन्ड निर्गम रहा।
डिमैट 2.0 को क्रिप्टोकरेंसी नहीं माना जा सकता। इसमें केवल बॉन्ड के स्वामित्व और उसके रखरखाव का तकनीकी ढांचा बदला जा रहा है। बॉन्ड से जुड़े निवेशक अधिकार, पुनर्भुगतान की जिम्मेदारी, क्रेडिट रेटिंग, डिबेंचर ट्रस्टी, सूचीबद्धता और प्रकटीकरण संबंधी नियम लागू रहेंगे।
फिलहाल इस सुविधा का शुरुआती चरण खुदरा निवेशकों के लिए उपलब्ध नहीं है। मौजूदा पायलट में भाग लेने वाले निवेशकों के लिए अलग प्रतिभूति खाता जरूरी नहीं है और टोकन आधारित बॉन्ड मौजूदा डिमैट खाते के जरिए रखे जा सकते हैं। हालांकि डिपॉजिटरी के साथ डिमैट 2.0 सुविधा सक्रिय करना और भाग लेने वाले बैंक के जरिए थोक ई-रुपया खाता बनाए रखना आवश्यक होगा।
आगे के चरणों में इस व्यवस्था को अनुरोध-आधारित बोली मंचों से जोड़ने और बाद में खुदरा निवेशकों तक पहुंचाने की योजना है। पायलट से मिलने वाले अनुभव के आधार पर इसके व्यापक विस्तार का फैसला होगा। इसका मूल उद्देश्य मौजूदा नियामकीय ढांचे को बदले बिना कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार के निर्गम, निपटान और भुगतान की पूरी प्रक्रिया को अधिक तेज और स्वचालित बनाना है।
