नई दिल्ली: देश में डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण विधायी बदलाव के तहत लोकसभा ने गुरुवार को पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 में संशोधन संबंधी विधेयक पारित कर दिया। इस संशोधन के बाद केंद्र सरकार को यह अधिकार मिल जाएगा कि वह अधिसूचना जारी कर बैंकों और अन्य भुगतान सेवा प्रदाताओं (PSPs) को यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) तथा अन्य अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर शुल्क या मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने की अनुमति दे सके।
यह संशोधन टैक्सेशन एंड अदर लॉज (संशोधन) विधेयक, 2026 का हिस्सा है, जिसे सदन में मंगलवार को पेश किया गया था। गुरुवार को संसद की कार्यवाही दोपहर 2 बजे पुनः शुरू होने के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विधेयक को विचार एवं पारित करने के लिए प्रस्तुत किया। विपक्ष के हंगामे के बीच बिना विस्तृत चर्चा के विधेयक को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गई।
मौजूदा व्यवस्था में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट की धारा 10ए के तहत बैंकों और भुगतान प्रणाली संचालकों को उन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क लगाने से रोका गया है, जिन्हें आयकर कानून के तहत अधिसूचित किया गया है। इसी कारण अब तक UPI लेनदेन पर कोई MDR या सेवा शुल्क नहीं लगाया जाता रहा है, जबकि RTGS और NEFT जैसी अन्य रियल-टाइम भुगतान प्रणालियों पर सेवा शुल्क लागू होता है।
नए संशोधन के तहत धारा 10ए में बदलाव करते हुए यह प्रावधान किया गया है कि आयकर अधिनियम की धारा 269SU का संदर्भ हटाकर केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया जाए कि वह अधिसूचना के माध्यम से एक या अधिक इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों को नामित कर सके, जिन पर शुल्क लगाने की अनुमति दी जा सके। इसका अर्थ यह नहीं है कि UPI पर तत्काल शुल्क लागू हो जाएगा, बल्कि सरकार को भविष्य में आवश्यकता के अनुसार इस संबंध में निर्णय लेने का वैधानिक अधिकार मिल जाएगा।
सरकार का कहना है कि इस संशोधन का उद्देश्य डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल तैयार करना है। सरकार के अनुसार, बैंक, भुगतान सेवा प्रदाता और डिजिटल भुगतान अवसंरचना विकसित करने वाली कंपनियां लगातार निवेश कर रही हैं और उनके लिए एक स्थायी वित्तीय व्यवस्था आवश्यक है, ताकि डिजिटल भुगतान प्रणाली का विस्तार और रखरखाव प्रभावी ढंग से जारी रह सके।
इस मुद्दे पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को कहा था कि फिलहाल UPI पर MDR लागू होने को लेकर चर्चा करना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि डिजिटल भुगतान अवसंरचना को मजबूत बनाए रखने के लिए लगातार निवेश की आवश्यकता होती है और इस व्यवस्था की लागत अंततः किसी न किसी को वहन करनी ही पड़ती है।
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मल्होत्रा ने कहा कि इसके दो ही विकल्प हैं। पहला, इस खर्च का वहन आम जनता करदाताओं के रूप में करे और दूसरा, “यूजर पेय” मॉडल के तहत मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू किया जाए, जिसमें लेनदेन करने वाला व्यापारी शुल्क का भुगतान करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल सरकार ने केवल कानूनी संशोधन का रास्ता अपनाया है और आगे की व्यवस्था समय के साथ स्पष्ट होगी।
बैंकिंग और डिजिटल भुगतान उद्योग लंबे समय से व्यापारी लेनदेन पर MDR लागू करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि डिजिटल भुगतान नेटवर्क के संचालन, सुरक्षा, तकनीकी उन्नयन और रखरखाव पर लगातार खर्च बढ़ रहा है, जबकि UPI पर शून्य MDR होने से इस लागत की भरपाई नहीं हो पा रही है।
दूसरी ओर, सरकार अब तक UPI को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस पर कोई शुल्क लगाने की अनुमति नहीं देती रही है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में UPI देश का सबसे लोकप्रिय डिजिटल भुगतान माध्यम बनकर उभरा है और हर महीने अरबों लेनदेन इसी प्लेटफॉर्म के माध्यम से किए जा रहे हैं।
उद्योग से जुड़े कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में MDR लागू किया जाता है तो इसे केवल एक निश्चित राशि से अधिक के व्यापारी (Merchant) UPI लेनदेन तक सीमित रखा जा सकता है, जबकि व्यक्ति-से-व्यक्ति (Peer-to-Peer) UPI ट्रांजैक्शन पहले की तरह निशुल्क बने रह सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में अंतिम निर्णय केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना जारी किए जाने के बाद ही स्पष्ट होगा।
विधेयक के पारित होने के साथ सरकार के पास अब डिजिटल भुगतान व्यवस्था में शुल्क संबंधी नीति तय करने का कानूनी अधिकार होगा। हालांकि, फिलहाल आम UPI उपयोगकर्ताओं या व्यापारियों पर किसी नए शुल्क की घोषणा नहीं की गई है और भविष्य में शुल्क लागू करने या न करने का अंतिम निर्णय केंद्र सरकार की अधिसूचना पर निर्भर करेगा।
