नई दिल्ली। साइबर ठगी और म्यूल खातों के जरिए होने वाले संदिग्ध वित्तीय लेनदेन पर लगने वाली बैंकिंग रोक को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक ने नई प्रक्रिया का प्रस्ताव रखा है। प्रस्तावित नियमों के तहत बैंक किसी संदिग्ध लेनदेन या असाधारण परिस्थितियों में पूरे खाते पर अस्थायी डेबिट रोक लगा सकेंगे, लेकिन ऐसी रोक सामान्य तौर पर 60 दिन से अधिक नहीं रह सकेगी। ग्राहक को अपनी सफाई देने के लिए 20 दिन का समय मिलेगा, जबकि बैंक को जवाब मिलने के बाद 10 दिन के भीतर मामले की समीक्षा कर निर्णय लेना होगा।
भारतीय रिजर्व बैंक के प्रस्तावित केवाईसी संशोधन निर्देश, 2026 में साइबर-सक्षम वित्तीय धोखाधड़ी और मनी म्यूल गतिविधियों से जुड़े खातों के लिए समयबद्ध प्रक्रिया तय करने का प्रस्ताव है। यह व्यवस्था 4 अगस्त 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तैयार की गई है। प्रस्तावित ढांचे के तहत बैंक 1 अप्रैल 2027 से पहले भी इन प्रावधानों को अपना सकते हैं, जबकि नई व्यवस्था 1 अप्रैल 2027 से लागू होने का प्रस्ताव है।
प्रस्ताव के मुताबिक, बैंक अपने लेनदेन निगरानी तंत्र के आधार पर संदिग्ध म्यूल गतिविधि की पहचान होने पर अस्थायी डेबिट रोक लगा सकेंगे। इसके लिए बैंक कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग आधारित निगरानी प्रणालियों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। हालांकि, केवल ₹1,000 या उससे अधिक के लेनदेन होने भर से खाता या रकम स्वत: फ्रीज नहीं होगी। लेनदेन में संदिग्ध संकेत मिलना जरूरी होगा।
ऐसे संकेतों में ग्राहक की सामान्य गतिविधियों की तुलना में असामान्य या असंगत लेनदेन, साइबर ठगी से जुड़े किसी खाते के साथ लेनदेन या पहले से संदिग्ध अथवा म्यूल खाते के रूप में रिपोर्ट किए गए खाते से जुड़ाव शामिल हो सकता है।
बैंक सामान्य स्थिति में केवल संदिग्ध लेनदेन पर रोक लगा सकेंगे। पूरे खाते पर रोक केवल असाधारण परिस्थितियों में और अंतिम विकल्प के तौर पर लगाने का प्रस्ताव है। रोक लगाए जाने के बाद बैंक को ग्राहक को इसकी जानकारी देनी होगी। उसे रोक का कारण, इसे हटाने की प्रक्रिया और मामले से जुड़े नामित अधिकारी की जानकारी भी देनी होगी।
ग्राहक को रोक लगाए जाने की तारीख से 20 दिन के भीतर अपनी सफाई या लेनदेन को सही ठहराने से जुड़े दस्तावेज देने का अवसर मिलेगा। यदि ग्राहक जवाब देता है तो बैंक को उस स्पष्टीकरण की जांच कर 10 दिन के भीतर निर्णय लेना होगा। यदि ग्राहक तय अवधि में कोई जवाब नहीं देता, तो बैंक को रोक लगाए जाने के 30 दिन के भीतर मामले पर निर्णय लेना होगा।
यदि बैंक ग्राहक की सफाई से संतुष्ट नहीं होता है, तो प्रस्तावित व्यवस्था के तहत मामला संबंधित पुलिस प्राधिकरण को भेजा जा सकेगा। इसके लिए राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के सिटिजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से संदर्भ भेजने का प्रावधान है। बैंक को रोक जारी रखने के कारण भी बताने होंगे और ग्राहक को मामले को पुलिस के पास भेजे जाने की जानकारी देनी होगी।
यदि सक्षम प्राधिकरण बैंक को रोक जारी रखने का निर्देश देता है, तो बैंक को उस निर्देश के अनुसार कार्रवाई करनी होगी। वहीं, पुलिस या सक्षम प्राधिकरण की ओर से संदर्भ भेजे जाने के 30 दिन के भीतर रोक जारी रखने का निर्देश नहीं मिलता है तो बैंक को 31वें दिन रोक हटानी होगी। किसी भी स्थिति में अस्थायी डेबिट रोक 60 दिन से अधिक नहीं हो सकेगी, जब तक सक्षम प्राधिकरण की ओर से अलग निर्देश न दिया जाए।
प्रस्तावित नियमों का दायरा वाणिज्यिक बैंकों के साथ-साथ स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, लोकल एरिया बैंक और शहरी सहकारी बैंकों तक होगा। बैंकों को मौजूदा धनशोधन रोधी नियमों के तहत जरूरी होने पर संदिग्ध लेनदेन रिपोर्ट भी दाखिल करनी होगी।
इसके अलावा बैंकों को संदिग्ध गतिविधियों की पहचान, डेबिट रोक लगाने, ग्राहकों को सूचना देने, रिकॉर्ड रखने और शिकायतों के निपटारे के लिए आंतरिक नीतियां बनानी होंगी। अस्थायी रोक से जुड़े रिकॉर्ड कम से कम पांच साल तक सुरक्षित रखने होंगे। खाता बंद होने की स्थिति में संबंधित रिकॉर्ड को खाता बंद होने की तारीख से कम से कम 10 साल तक रखने का प्रस्ताव है।
ग्राहकों की शिकायतों के समाधान के लिए बैंकों को क्षेत्रीय, जोनल और मुख्यालय स्तर पर नोडल अधिकारी नियुक्त करने होंगे। प्रस्तावित प्रक्रिया के तहत इस व्यवस्था से जुड़ी ग्राहक शिकायतों का निपटारा 30 दिन के भीतर करना होगा। इसका उद्देश्य साइबर ठगी से जुड़े संदिग्ध लेनदेन पर कार्रवाई और वैध ग्राहकों के खातों पर लगी रोक के समाधान के बीच समयबद्ध प्रक्रिया स्थापित करना है।
