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Policy Watch

ऋणधारक ने नहीं चुकाया लोन तो गारंटर से वसूली कर सकता है बैंक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksAugust 12, 2026No Comments4 Mins Read
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लखनऊ पीठ ने कहा- मुख्य देनदार के खिलाफ सभी कानूनी उपाय खत्म करना बैंक के लिए जरूरी नहीं; गारंटर की देनदारी भी मूल उधारकर्ता के बराबर
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लखनऊ: ऋण की अदायगी में मुख्य उधारकर्ता के डिफॉल्ट करने पर बैंक सीधे गारंटर से भी बकाया रकम की वसूली कर सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बैंक को गारंटर के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने से पहले मुख्य देनदार से वसूली के सभी कानूनी विकल्प समाप्त करना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि गारंटर की देनदारी मूल ऋणधारक की देनदारी के समान होती है और लेनदार अपनी बकाया राशि की वसूली के लिए मुख्य देनदार, गारंटर या दोनों के खिलाफ एक साथ कार्रवाई कर सकता है।

यह फैसला न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने विनीत पांडे और अनूप कुमार मिश्रा की याचिका खारिज करते हुए सुनाया। दोनों याचिकाकर्ताओं ने यूपी पोस्टल प्राइमरी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की ओर से शुरू की गई वेतन से वसूली की कार्रवाई को चुनौती दी थी। अदालत ने उनके इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि पहले बैंक को मुख्य उधारकर्ता से पूरी रकम वसूलनी चाहिए और उसके बाद ही गारंटरों से भुगतान मांगा जा सकता है।

तीन अलग-अलग ऋणों के लिए बने थे गारंटर

मामला विक्रांत दुबे की ओर से लिए गए तीन ऋणों से जुड़ा है। विनीत पांडे और अनूप कुमार मिश्रा ने इन ऋणों में गारंटर के तौर पर हस्ताक्षर किए थे। रिकॉर्ड के अनुसार, विक्रांत दुबे ने वर्ष 2022-23 के दौरान यूपी पोस्टल प्राइमरी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड से तीन अलग-अलग ऋण लिए थे।

इनमें पहला ₹50,000 का त्योहार ऋण, दूसरा ₹3 लाख का अल्पकालिक ऋण और तीसरा ₹18 लाख का व्यक्तिगत ऋण था। दोनों याचिकाकर्ताओं ने इन ऋणों के लिए गारंटी दी थी। बाद में मुख्य उधारकर्ता ने ऋण की निर्धारित किस्तों और बकाया राशि का भुगतान नहीं किया, जिसके बाद बैंक ने वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी।

बैंक ने वेतन से कटौती के दिए निर्देश

ऋण की अदायगी में चूक के बाद बैंक ने डाक विभाग को दोनों गारंटरों के वेतन से हर महीने ₹10,000 की कटौती करने का निर्देश दिया। इसके बाद विनीत पांडे और अनूप कुमार मिश्रा ने हाईकोर्ट का रुख किया। उनका कहना था कि बैंक की ओर से सीधे गारंटरों के वेतन से रकम काटना उचित नहीं है।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने तर्क दिया कि बैंक को सबसे पहले मूल ऋणधारक विक्रांत दुबे से बकाया राशि की वसूली करनी चाहिए। उनके अनुसार, यदि मुख्य उधारकर्ता से पूरी रकम वसूल नहीं हो पाती, तभी बची हुई राशि के लिए गारंटरों से संपर्क किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने खारिज किया गारंटरों का तर्क

खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने ऋण और गारंटी से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए कहा कि गारंटर की जिम्मेदारी केवल उस स्थिति में शुरू नहीं होती जब मुख्य देनदार से वसूली के सभी प्रयास विफल हो जाएं। बैंक को पहले मुख्य उधारकर्ता के खिलाफ हर संभव कानूनी उपाय आजमाने की बाध्यता नहीं है।

अदालत के अनुसार, गारंटर की देनदारी मूल देनदार की देनदारी के समान होती है। इसलिए ऋणदाता अपनी बकाया राशि की वसूली के लिए मुख्य देनदार या गारंटर में से किसी एक के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। आवश्यकता होने पर दोनों के खिलाफ एक साथ भी कानूनी कदम उठाया जा सकता है।

बैंक की वसूली प्रक्रिया को मिली कानूनी मजबूती

हाईकोर्ट के इस फैसले से बैंक और वित्तीय संस्थानों की ऋण वसूली प्रक्रिया को महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता मिली है। खासतौर पर ऐसे मामलों में, जहां मुख्य उधारकर्ता ऋण चुकाने में असफल रहता है, गारंटर यह दावा करके वसूली से नहीं बच सकता कि बैंक को पहले मूल देनदार से पूरी रकम वसूल करनी चाहिए।

अदालत ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि गारंटी देना केवल औपचारिकता नहीं है। जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के ऋण के लिए गारंटर बनता है, तो वह ऋण की अदायगी को लेकर कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है। हालांकि, इस मामले में वास्तविक बकाया राशि और वसूली की प्रक्रिया संबंधित ऋण दस्तावेजों तथा लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार निर्धारित होगी।

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