रांची: कोल माइंस प्रोविडेंट फंड (CMPF) से जुड़ी ₹727.67 करोड़ की कथित वित्तीय गड़बड़ी और नुकसान का मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया कि इतनी बड़ी राशि के कथित नुकसान के बावजूद अब तक FIR क्यों दर्ज नहीं की गई। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और अन्य प्रतिवादियों से आंतरिक विजिलेंस जांच के अलावा आपराधिक कार्रवाई को लेकर उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी है। अदालत ने यह भी पूछा है कि क्या FIR दर्ज करने या किसी अन्य आपराधिक कार्रवाई का प्रस्ताव विचाराधीन है।
चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सभी संबंधित प्रतिवादियों को मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने इसके लिए 3 सितंबर तक का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी।
₹727.67 करोड़ के नुकसान का दावा
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में आरोप लगाया गया कि कोल माइंस प्रोविडेंट फंड के संचालन और उसके निवेश से जुड़े फैसलों में कथित लापरवाही और गलत निर्णयों के कारण ₹727.67 करोड़ की राशि नुकसान में चली गई। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि फंड के निवेश और वित्तीय प्रबंधन की निगरानी के लिए जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारियों ने ऐसे फैसले लिए, जिनका प्रतिकूल असर फंड की वित्तीय स्थिति पर पड़ा।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि फंड के प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों ने निवेश संबंधी मामलों में नियुक्त फंड मैनेजरों और विशेषज्ञों की सलाह को कथित तौर पर नजरअंदाज किया। उनका कहना है कि विशेषज्ञों की सलाह पर पर्याप्त विचार किया जाता तो इतनी बड़ी राशि के नुकसान की स्थिति से बचा जा सकता था।
विजिलेंस जांच के बावजूद FIR पर सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत का मुख्य फोकस इस बात पर रहा कि मामले में आंतरिक विजिलेंस स्तर पर जांच होने के बावजूद आपराधिक कार्रवाई की दिशा में क्या कदम उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि उनकी जानकारी के अनुसार अब तक इस मामले में कोई FIR दर्ज नहीं की गई है।
हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या विजिलेंस जांच के निष्कर्षों के आधार पर किसी आपराधिक मामले की जरूरत महसूस की गई है। यदि FIR दर्ज करने का प्रस्ताव है तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है, इसकी जानकारी भी अदालत के सामने रखने को कहा गया है।
अदालत के निर्देश के बाद अब केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को अपने-अपने हलफनामों में जांच और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
निवेश प्रक्रिया और फैसलों की होगी जांच
मामले में अब यह भी महत्वपूर्ण होगा कि ₹727.67 करोड़ के कथित नुकसान के पीछे किन निवेश फैसलों की भूमिका थी और उन्हें लेने की प्रक्रिया क्या रही। याचिकाकर्ताओं के आरोपों के अनुसार, फंड मैनेजरों और विशेषज्ञों की सलाह को नजरअंदाज किए जाने से जोखिम बढ़ा।
अदालत के समक्ष दाखिल होने वाले जवाब में संबंधित पक्षों को यह बताना होगा कि निवेश संबंधी फैसले किन नियमों और प्रक्रियाओं के तहत लिए गए थे। साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि कथित नुकसान का आकलन किस आधार पर किया गया और इसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
3 सितंबर तक हलफनामा, 10 सितंबर को सुनवाई
खंडपीठ ने सभी प्रतिवादियों को 3 सितंबर तक विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। इन हलफनामों में आंतरिक विजिलेंस जांच, वित्तीय नुकसान, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका और संभावित आपराधिक कार्रवाई से संबंधित जानकारी देने की अपेक्षा है।
मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी। उस दौरान अदालत यह देख सकती है कि प्रतिवादियों ने FIR और अन्य आपराधिक कार्रवाई के संबंध में क्या स्थिति बताई है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने किसी अधिकारी या व्यक्ति को दोषी ठहराने का निष्कर्ष नहीं दिया है। मामले में लगाए गए आरोपों और ₹727.67 करोड़ के कथित नुकसान की वास्तविक स्थिति जांच और अदालत के समक्ष पेश किए जाने वाले दस्तावेजों से स्पष्ट होगी।
